चूरू: 'उम्र बस एक नंबर है', 93 की उम्र में भी ट्रैक पर दौड़ते हनुमानराम; पुनिया परिवार एथलेटिक्स में बना मिसाल

राजस्थान में चूरू जिले के पुनिया परिवार के 93 वर्षीय हनुमानराम, 73 वर्षीय बीरबलराम और 50 वर्षीय रतिराम अपनी फिटनेस और मेडल जीतकर मिसाल बन गए हैं. जहां तीन पीढ़ियों का यह जुनून कई स्वर्ण पदकों के साथ चर्चा में है.

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93 वर्षीय हनुमानराम.

Rajasthan News: राजस्थान के चूरू जिले में एक परिवार ऐसा है जो साबित करता है कि उम्र कभी सपनों की राह में रुकावट नहीं बनती. यहां के पुनिया की ढाणी गांव में रहने वाले 93 साल के हनुमानराम पुनिया आज भी मैदान पर दौड़ते हैं और पदक जीतते हैं. उनका जज्बा युवाओं को प्रेरित करता है.

परिवार का खेल प्रेम

हनुमानराम पुनिया हर रोज व्यायाम करते हैं. उनके साथ 73 साल के बीरबलराम पुनिया भी मैदान पर पसीना बहाते हैं. दोनों मिलकर दौड़ लगाते हैं जंप करते हैं और गोला फेंकते हैं.

दिलचस्प बात यह है कि हनुमानराम को ट्रेनिंग उनके 50 साल के बेटे रतिराम पुनिया देते हैं. यह जुनून तीन पीढ़ियों में फैला हुआ है. रतिराम कल्याणपुरा गांव में स्कूल चलाते हैं और बच्चों को अपने पिता व चाचा से सीखने के लिए कहते हैं.

प्रतियोगिता में शानदार प्रदर्शन

हाल ही में अलवर के आरआर कॉलेज में हुई राजस्थान स्टेट मास्टर एथलेटिक्स प्रतियोगिता में इस परिवार ने कमाल कर दिया. 90 से ज्यादा उम्र वर्ग में हनुमानराम ने 5000 मीटर पैदल चाल और गोला फेंक में स्वर्ण पदक जीते. भाला फेंक में उन्हें रजत पदक मिला. इससे उन्होंने नया रिकॉर्ड बनाया.

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70 से ज्यादा उम्र वर्ग में बीरबलराम ने त्रिकूट में स्वर्ण पदक हासिल किया. गोला फेंक और तश्तरी फेंक में रजत पदक उनके नाम रहा. 50 उम्र वर्ग में रतिराम ने त्रिकूट और गोला फेंक में स्वर्ण पदक जीतकर परिवार की जीत की लड़ी को मजबूत किया.

सेहत का राज और संदेश

हनुमानराम बताते हैं कि वे बाजरे की रोटी और घी खाते हैं. उन्हें दिल का दौरा पड़ने का कोई डर नहीं है. खेल उन्हें युवा बनाए रखते हैं. वे युवाओं से कहते हैं कि नशे से दूर रहो नियमित व्यायाम करो और फिट रहो. रतिराम का कहना है कि यह उम्र आराम करने की नहीं बल्कि काम करने की है. खेल और कसरत से बीमारियां दूर रहती हैं.

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बीरबलराम मानते हैं कि बुढ़ापे में आराम की सोच गलत है. अब खुद के लिए जीने का समय है. वे रोज सुबह शाम ट्रैक पर दौड़ते हैं और व्यायाम करते हैं. इसी जोश से उन्होंने प्रतियोगिताओं में नाम कमाया. 

शुरू से देखा बड़ा सपना

हनुमानराम और बीरबलराम का सपना एशियाड में खेलकर पदक जीतना है. इसके लिए वे दिन रात मेहनत कर रहे हैं. जब युवा छोटी मुश्किलों से डर जाते हैं तब ये बुजुर्ग अपनी मेहनत और खेल भावना से बताते हैं कि अगर हौसला हो तो उम्र कभी बाधा नहीं बनती. मैदान हमेशा जीतने वालों का इंतजार करता है.

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