ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव अब भारतीय मंडियों तक पहुंच गया है. खाड़ी देशों में युद्ध जैसी स्थितियों के कारण ईसबगोल और जीरे की अंतरराष्ट्रीय मांग में भारी गिरावट दर्ज की गई है. इस वैश्विक संकट का सीधा असर अब स्थानीय किसानों और व्यापारियों की जेब पर पड़ रहा है, जिन्हें फसल का उचित दाम न मिलने से भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है. वर्तमान में ईसबगोल का एक्सपोर्ट ना के बराबर हो गया है.
युद्ध से डिमांड घटी इन देशों में होता था एक्सपोर्ट
युद्ध के कारण हालात ऐसे है कि निर्यात कम हो गया है. व्यापारियों का कहना कि इस बार ईसबगोल की डिमांड नहीं के बराबर है. ईरान-अमेरिका विवाद के चलते समुद्री रास्तों पर जोखिम बढ़ गया है. इसके परिणामस्वरूप शिपिंग कंपनियों ने कंटेनरों का किराया 3 से 4 गुना तक बढ़ा दिया है.माल ढुलाई महंगी होने के कारण गल्फ देशों के साथ जर्मनी, रशिया और यूरोपीय देशों में जाने वाला ईसबगोल का निर्यात ठप सा हो गया है. वही निर्यातकों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में इस समय भारतीय ईसबगोल की मांग 'ना के बराबर' रह गई है.
मंडी में 25 प्रतिशत तक का भाव में आया अंतर
निर्यात रुकने का असर सीधे तौर पर अब स्थानीय मंडियों की कीमतों पर भी दिख रहा है. पिछले साल के मुकाबले इस साल ईसबगोल और जीरे की कीमतों में 25 प्रतिशत तक की कमी आई है. पिछले साल ईसबगोल के भाव 13 हजार से 14 हजार था. इस बार यही रेट 10 हजार से 12 हजार तक है. वही जीरे की कीमत पिछले साल 21 हजार से पच्चीस हजार तक थी,इस बार यह 16 हजार तक है. जिससे किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है.
ओलावृष्टि और बारिश से फसल हुई खराब
किसानों को इस बार दोहरी मार झेलनी पड़ रही है एक ओर जहां बारिश और ओलावृष्टि ने किसानों की फसल खराब कर दी तो वहीं दूसरी और मंडी में मिलने वाली कीमत से किसानों को दोहरी आर्थिक मार झेलनी पड़ रही है.
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