Rajasthan News: राजस्थान में तबादले (Transfer) की सियासत कोई नई बात नहीं है, लेकिन इस बार मामला कुछ अलग है. अमूमन फाइलों में दब जाने वाले तबादले के आदेश अब राजस्थान हाई कोर्ट (Rajasthan High Court) की मेज पर हैं और जस्टिस समीर जैन की तल्ख टिप्पणियों ने सरकार की नींद उड़ा दी है. कोर्ट ने शिक्षा विभाग में बीच सत्र में हुए तबादले पर तल्ख सवाल किए.
टाइमिंग का फेर, जिसने विवाद को जन्म दिया
इस पूरे विवाद की जड़ किसी एक ट्रांसफर में नहीं, बल्कि उन तबादलों की 'टाइमिंग' में छिपी है. दरअसल, शिक्षा विभाग ने बीते दिसंबर और इसी जनवरी (2025-26) के महीनों में ताबड़तोड़ तबादला सूचियां जारी कीं. राजस्थान शिक्षा विभाग का अपना कैलेंडर (Shivira Calendar) कहता है कि शिक्षकों के तबादले मुख्य रूप से गर्मियों की छुट्टियों में होने चाहिए, लेकिन जब छात्र बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी के लिए आखिरी बार अपना सिलेबस दोहरा रहे थे, ठीक उसी वक्त उनके शिक्षकों के पास रवानगी के आदेश पहुंच गए. इसी विरोधाभास ने शिक्षकों को कोर्ट की दहलीज तक पहुंचा दिया. ध्यान दिला दें कि बीते कुछ पहले तक जो बच्चों के प्रदर्शन करने की खबरें आ रही थीं, वो इन्हीं तबादलों के विरोध में थीं.
जब कोर्ट ने पूछा- इतनी भी क्या जल्दी थी?
बुधवार को मैना गढ़वाल और महेंद्र कुमार की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने इसी 'जल्दबाजी' पर सवाल उठाए हैं. याचिकाकर्ताओं की ओर से एडवोकेट संदीप कलवानिया ने कोर्ट में दलील दी कि बीच सत्र में शिक्षक के बदलने से न केवल छात्र मानसिक रूप से परेशान होते हैं, बल्कि उनका साल भी खराब होने का डर रहता है. कोर्ट ने दलीलों को वाजिब माना और अब यह बताना होगा कि आखिर किन 'प्रशासनिक अनिवार्यताओं' के चलते छात्रों के भविष्य को दांव पर लगाया गया.
सुनवाई के दौरान अदालत ने मामले पर स्पष्टीकरण देने के लिए मुख्य सचिव और प्रमुख शिक्षा सचिव को 23 जनवरी को हाईकोर्ट में व्यक्तिगत या वीसी के जरिए उपस्थित रहने के लिए निर्देशित किया था, लेकिन बाद में महाधिवक्ता के आश्वासन के बाद कोर्ट ने दोनों अधिकारियों को उपस्थिति से छूट दे दी.
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