What is Bhoo Samadhi: पश्चिमी राजस्थान में अपने भजनों से सुरीली आवाज के लिए घर-घर में छाई साध्वी प्रेम बाईसा की 28 जनवरी को संदिग्ध हालातों में मौत हो गई. आज शुक्रवार, 30 जनवरी को उनका अंतिम संस्कार उनके पैतृक गांव बालोतरा के परेऊ गांव में हुआ. लेकिन उनका अंतिम संस्कार साधु संतों की परंपरा के अनुसार किया गया. उनका दाह संस्कार नहीं किया गया बल्कि समाधि दी गई. इस दौरान बड़ी संख्या में साधु-संत मौजूद रहे. इसी के साथ एक बार फिर से निधन के साथ 'साधुओं को समाधि' देने की चर्चा को काफी बल मिला है.
बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार सनातन धर्म में अंतिम संस्कार की अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं. इनमें एक भू-समाधि है. जिसके बारे में लोग अक्सर जानना चाहते है कि आखिर भू-समाधि कैसे दी जाती है, किसे दी जाती है.
Sadhvi Prem Baisa bhoo samadhi
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भू समाधि क्या है
भू-समाधि (Bhoo Samadhi) साधु-संतों की एक अंतिम संस्कार की परंपरा है, जिसमें उनके पार्थिव शरीर को जलाया नहीं जाता, बल्कि पद्मासन या सिद्धासन जैसी ध्यान मुद्रा में बिठाकर जमीन (मिट्टी) में दफना दिया जाता है, ताकि उनका शरीर पंचतत्वों में विलीन हो सकें. ऐसा माना जाता है कि सिद्ध पुरुषों में आध्यात्मिक ऊर्जा बहुत होती है. ऐसे में अग्नि के हवाले करने से उनकी ऊर्जा नष्ट होती है. इसे बनाए रखने और भक्तों का उचित मार्गदर्शन हो सके, इसलिए ऐसा किया जाता है.
भू-समाधि किसे दी जाती है
बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक भोलानाथ और उनके जरिए धरती पर लेने अवतारों और उन्हें अपना गुरु बनाने वालों को शैव कहते है. शैव पंथ के सात मुख्य अखाड़े हैं. इसमें जूना, महानिर्वाणी, आह्वान, निरंजनी, आनंद, अटल, अग्नि अखाड़ा शामिल है. इन अखाड़ों के साधु-संतों को भू और जल समाधि दी जाती है.
भू-समाधि में पद्मासन या सिद्धिसन की मुद्रा में बिठाकर जमीन में दफना दिया जाता है. साध्वी प्रेम बाइसा को भी इसी तरह से भू-समाधि दी गई. शैव, नाथ, दशनामी, अघोर और शाक्त परंपरा के साधु-संतों को भू-समाधि देते हैं. साध्वी प्रेम बाइसा के पिता और गुरु विरमनाथ ने जानकारी दी कि वह नाथ संप्रदाय संबंध से रखती थी.
कैसे दी जाती है भू-समाधि
समाधि देने से पहले उस साधु या साध्वी के पार्थिव शरीर के साथ शोभायात्रा निकाली जाती है जिससे उनके सभी भक्त दर्शन कर सकें. आखिर में, पार्थिव शरीर को समाधि स्थल पर लाया जाता है. समाधि देने वाले साधु या साध्वी को सुखासन और पद्मासन में बिठाकर समाधि स्थल तक लाया जाता जाती है.
उसके बाद समाधि देते समय उनका मुंह उत्तर दिशा की ओर किया जाता है क्योंकि माना जाता है इस दिशा में कैलाश पर्वत है. इसके बाद समाधि स्थल तक नीचे जाने के लिए एक छोटा रास्ता बनाया जाता है. कई ऐसे मंत्रों का जाप किया जाता है जिन्हें खुलकर नहीं बताया जा सकता.
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