कोटा: किसानों के खेत तक पहुंची युद्ध की मार, कच्चे माल की कमी से कट्टों के दाम में उछाल

एक तरफ उत्पादन की लागत और दूसरी तरफ पैकेजिंग का खर्च से किसानों का मुनाफा सीधे तौर पर प्रभावित हो रहा है. यानी वैश्विक युद्ध का असर अब खेत और किसान की जेब तक पहुंच चुका है, अगर हालात ऐसे ही बने रहे तो आने वाले समय में खेती की लागत और बढ़ सकती है.

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Rajasthan News: अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच जारी युद्ध का असर अब सिर्फ अंतरराष्ट्रीय राजनीति तक सीमित नहीं रहा. अब इसका सीधा असर भारत के किसानों तक पहुंचने लगा है. खासकर हाड़ौती के लहसुन किसानों पर इस युद्ध का बड़ा आर्थिक झटका देखने को मिल रहा है. वजह है कि प्लास्टिक के कट्टों की कीमतों में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है. ईरान और इजराइल युद्ध ने पेट्रोकेमिकल सेक्टर को हिला कर रख दिया है. रिफाइनरी और पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स पर हमलों के चलते सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हुई है. जिसका असर अब पॉलीमर इंडस्ट्री पर साफ दिखाई दे रहा है. 

कट्टों की कीमतों में 50 फीसदी की बढ़ोत्तरी

पॉलीमर इंडस्ट्री से बनने वाले प्लास्टिक दाने से ही प्लास्टिक और जालीदार कट्टे तैयार होते हैं, लेकिन कच्चे माल की कमी और महंगे होने से इन कट्टों की कीमतों में 50 फीसदी तक का उछाल आ गया है. जो कट्टा पहले 14 रुपये में मिल जाता था. वही अब 20 से 25 रुपये तक पहुंच गया है, यानी सीधे-सीधे लागत में भारी इजाफा हुआ है. सीड्स मर्चेंट एसोसिएशन के पदाधिकारियों के मुताबिक, पहले से ही जूट के कट्टों की कमी चल रही थी.

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महंगे कट्टों ने बढ़ाई किसानों की परेशानी

ऐसे में प्लास्टिक के कट्टों से उम्मीद थी, लेकिन युद्ध ने इस विकल्प को भी महंगा और सीमित कर दिया है. हाड़ौती में लहसुन की बंपर पैदावार होती है और इसे स्टोर करने के लिए खास तौर पर जालीदार प्लास्टिक कट्टों का इस्तेमाल किया जाता है. ताकि लहसुन खराब ना हो. मंडी में लहसुन की बोली भी तभी लगती है, जब वह सही तरीके से कट्टों में भरा हो, यानी कट्टा नहीं तो व्यापार नहीं, अब महंगे कट्टों ने किसानों की परेशानी बढ़ा दी है. 

एक तरफ उत्पादन की लागत और दूसरी तरफ पैकेजिंग का खर्च से किसानों का मुनाफा सीधे तौर पर प्रभावित हो रहा है. यानी वैश्विक युद्ध का असर अब खेत और किसान की जेब तक पहुंच चुका है, अगर हालात ऐसे ही बने रहे तो आने वाले समय में खेती की लागत और बढ़ सकती है. युद्ध का असर अब सिर्फ सीमाओं तक सीमित नहीं रहा. बल्कि इसकी आंच अब किसानों की आजीविका तक पहुंच रही है. सवाल यही है कि क्या इस बढ़ती लागत से किसानों को राहत मिल पाएगी. उम्मीद की जानी चाहिये कि जल्द हालात सामान्य हो ताकि किसानों को राहत मिल सके. 

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