'क्या बेटी होना ही मेरा दोष है?' रेपिस्ट पिता की उम्रकैद बरकरार; राजस्थान हाईकोर्ट ने फैसले में बयां किया बेटियों का दर्द

राजस्थान हाईकोर्ट ने नाबालिग बेटी से दुष्कर्म मामले में आरोपी पिता की अपील खारिज कर उम्रकैद बरकरार रखी है. जस्टिस विनीत कुमार माथुर की खंडपीठ ने पीड़िता को 7 लाख रुपये मुआवजा देने और समाज में बेटियों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल उठाए हैं.

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जब परिवार मुकर गया तो 14 साल की बेटी ने मोबाइल से बेनकाब किया 'दरिंदा पिता', राजस्थान हाईकोर्ट ने बरकरार रखी उम्रकैद (फाइल फोटो)

Jodhpur News: राजस्थान हाईकोर्ट ने रिश्तों को शर्मसार करने वाले एक मामले में सख्त रुख अपनाते हुए नाबालिग बेटी से दुष्कर्म के दोषी पिता की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है. जस्टिस विनीत कुमार माथुर और जस्टिस चन्द्रशेखर शर्मा की खंडपीठ ने आरोपी पिता की अपील को सिरे से खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि पिता बच्चे का सबसे बड़ा संरक्षक होता है. कोर्ट ने कहा कि यदि संरक्षक ही विश्वास तोड़ने लगे, तो यह समूचे समाज के लिए एक गंभीर और चिंताजनक स्थिति है.

मार्च 2023 से शुरू हुई इंसाफ की लड़ाई

यह मामला पाली जिले का है, जिसकी शुरुआत मार्च 2023 में हुई थी. पीड़िता के चचेरे भाई ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी कि उसकी 14 वर्षीय बहन अचानक लापता हो गई है. पुलिस ने जब जांच शुरू की, तो एक ऐसी हकीकत सामने आई जिसने सबको झकझोर दिया. जांच में पता चला कि नाबालिग लड़की लंबे समय से अपने ही पिता के दुर्व्यवहार और गलत हरकतों का शिकार हो रही थी. पीड़िता की मां उससे अलग रह रही थी और वह अपने पिता के साथ ही रहती थी, जिसका फायदा उठाकर आरोपी ने उसके साथ अनुचित कृत्य किया.

अपनों ने नहीं किया यकीन तो खुद जुटाए सबूत

इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू पीड़िता का साहस है. शुरुआत में जब उसने अपने साथ हो रहे गलत व्यवहार की जानकारी परिवार के अन्य सदस्यों को दी, तो किसी ने भी उसकी बात पर विश्वास नहीं किया. ऐसी स्थिति में पीड़िता ने हिम्मत नहीं हारी और अपने मोबाइल फोन से एक वीडियो रिकॉर्ड कर लिया. यह वीडियो बाद में अदालत की कार्यवाही में सबसे अहम इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य साबित हुआ. ट्रायल के दौरान इस वीडियो और पीड़िता के बयानों को आधार बनाकर पाली की विशेष पॉक्सो अदालत ने आरोपी को दोषी माना था.

ट्रायल कोर्ट के फैसले पर हाईकोर्ट की मुहर

पाली की विशेष पॉक्सो अदालत ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता (IPC) और पॉक्सो एक्ट की विभिन्न धाराओं के तहत उसके प्राकृतिक जीवनकाल (मरते दम तक) के लिए उम्रकैद की सजा सुनाई थी. इस फैसले को आरोपी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, लेकिन हाईकोर्ट ने पीड़िता की गवाही को पूरी तरह विश्वसनीय माना. कोर्ट ने अपने फैसले में यह अहम टिप्पणी भी की कि यदि पीड़िता की गवाही स्पष्ट और भरोसेमंद हो, तो वह अकेले ही किसी के अपराध को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त आधार हो सकती है.

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पीड़िता को 7 लाख का मुआवजा देने के आदेश

अदालत ने केवल सजा ही बरकरार नहीं रखी, बल्कि पीड़िता के पुनर्वास के लिए राज्य सरकार को उसे 7 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश भी दिया है. फैसला सुनाते हुए जस्टिस विनीत कुमार माथुर ने समाज की अंतरात्मा पर कई सवाल दागे. उन्होंने कहा कि आज भी समाज की कई बेटियां भीतर ही भीतर ऐसी पीड़ा सह रही हैं. अदालत ने पूछा कि वह समय कब आएगा जब समाज की राहें और चौखटें बेटियों के लिए वाकई सुरक्षित होंगी? जस्टिस माथुर ने समाज से सवाल किया कि क्या हम ऐसा वातावरण बना पाएंगे जहां बेटी होना अपराध नहीं, बल्कि सम्मान का प्रतीक बने. कोर्ट ने माना कि ऐसे मामलों में न्याय देना केवल सजा तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज में सुरक्षा की भावना को मजबूत करना भी अदालत का दायित्व है.

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