राजनीति में किसी भी जनप्रतिनिधि की तरफ से किताब लिखा जाना बहुत महत्वपूर्ण होता है. अगर वह किताब नेता के जीवन वृतांत की हो तो उसकी अलग अहमियत होती है, लेकिन अगर कोई राजनेता आत्मकथा लिख दे, तो यह और भी ज्यादा बड़ी बात हो जाती है. ऐसी ही एक आत्मकथा जो कभी लिखी नहीं जा सकी, उसकी चर्चा भरे सभागार में हुई, इस चर्चा पर कुछ चेहरे मुस्कुराए तो कुछ गंभीर भी हुए. दरअसल, विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी की तरफ से पिछले दो साल के दौरान विधानसभा में किए गए नवाचारों पर एक कॉफी टेबल बुक तैयार कराई है जिसका विमोचन मंगलवार को कांस्टीट्यूशन क्लब में हुआ. लेकिन इस मौके पर सरकारी मुख्य सचेतक जोगेश्वर गर्ग ने अपनी आत्मकथा को लेकर एक ऐसी चर्चा को जन्म दे दिया जो अभी अस्तित्व में तो नहीं है लेकिन फिर भी लोग इसका इंतजार जरूर करेंगे.
जोगेश्वर गर्ग ने सुनाया 2018 का किस्सा
विधानसभा अध्यक्ष की कॉफी टेबल बुक के कार्यक्रम में जोगेश्वर गर्ग ने भी अपनी उसी आत्मकथा को लेकर चर्चा की जो कभी किताब की शक्ल में अस्तित्व में नहीं आई. भरे सभागार में जोगेश्वर गर्ग ने कहा कि 2018 के चुनाव से पहले जब टिकट देने की बारी आई, तो उन्हें अपने टिकट की चिंता लग रही थी. गर्ग ने बताया कि उन्होंने संगठन में ओंकार सिंह लखावत और उन जैसे दूसरे वरिष्ठ नेताओं को साफ कह दिया था कि जालौर सीट से टिकट उन्हें ही दिया जाए.
आज कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष आदरणीय श्री @VasudevDevnani जी द्वारा लिखित पुस्तक “संसदीय संस्कृति का उत्कर्ष – नवाचारों के 2 वर्ष” का माननीय मुख्यमंत्री श्री @BhajanlalBjp जी की गरिमामयी उपस्थिति में विमोचन कार्यक्रम में सहभागिता सुनिश्चित की।
— Dr Prem Chand Bairwa (@DrPremBairwa) March 10, 2026
यह पुस्तक… pic.twitter.com/hDIxmXERlS
जोगेश्वर गर्ग ने अपने अंदाज में बताया कि उन्होंने संगठन को यह भी बता दिया था कि अगर उनका टिकट नहीं दिया गया तो वह आत्मकथा लिख देंगे. हालांकि उनकी इस चर्चा ने कई लोगों के चेहरों पर मुस्कान ला दी तो कई चेहरे गंभीर भी दिखे. मौके की नजाकत समझते हुए गर्ग ने तुरंत ही बात संभाली और मंच पर मौजूद नेताओं की खूबियों की बात करने लगे.
नेताओं की आत्मकथा
किसी भी राजनेता की लिखी किताब जन चर्चा का विषय बनती है, क्योंकि उसमें कई बार रोचक खुलासे होते हैं. अपने संस्मरण होते हैं. यह किताब जीवन वृतांत या जीवनी हो तो अलग बात होती है, लेकिन अगर कोई राजनेता आत्मकथा लिख दे, तो ऐसे मौके, किताब और उसमें लिखी बातें सब कुछ लोगों की उत्सुकता बढ़ाते हैं. हालांकि आत्मकथा लिखना किसी भी राजनेता के लिए ज्यादा चुनौतीपूर्ण काम होता है, क्योंकि आत्मकथा का मतलब तो सच ही होता है, जिसे कई लोग याद करना पसंद करते हैं, तो कई लोग चाहते हैं कि उस पर पर्दा पड़े रहने में ही बेहतरी है.