Rajasthan's First CM Hiralal Shastri's Death anniversary: राजस्थान के पहले मुख्यमंत्री पंडित हीरालाल शास्त्री (Hiralal Shastri) की आज (28 दिसंबर) पुण्यतिथि है. जयपुर के जोबनेर कस्बे में जन्मे शास्त्री का राजनीतिक करियर काफी उतार-चढ़ाव वाला रहा. जब 30 मार्च 1949 को राजस्थान के एक राज्य के रूप में स्थापित हुआ तो पूर्व पीएम जवाहरलाल नेहरू और तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल पर सभी की निगाहें थीं. प्रदेश के पहले सीएम के लिए नाम का इंतजार था. उस समय तेज तर्रार माने जाने वाले नेता जयनारायण व्यास और माणिक्यलाल वर्मा दिल्ली तक अपनी पैठ बना चुके थे. लेकिन पटेल की पसंद के चलते पं. शास्त्री को यह जिम्मेदारी दी गई. हालांकि उनके नाम के ऐलान के बाद वह कई दिग्गज नेताओं की आंखों में खटकने लगे थे.
2 साल के भीतर ही छोड़ना पड़ा पद
इसी बीच पटेल के निधन के बाद शास्त्री की दिल्ली में पकड़ कमजोर होती चली गई. नेहरू के करीबी माने जाने वाले मारवाड़-जयपुर के कांग्रेसी नेताओं ने इस बात का भरपूर फायदा उठाया. नतीजा यह रहा कि उन्होंने 1951 में अपने पद से इस्तीफा दे दिया. उन्हें पद से इस्तीफा देना पड़ा और तत्कालीन आईसीएस अफसर सीएम वेकंटचारी को कुर्सी सौंप दी गई. लेकिन शास्त्री 1957 में सक्रिय राजनीति में वापस आ गए और सवाई माधोपुर निर्वाचन क्षेत्र से दूसरी लोकसभा के सदस्य चुने गए.
इससे पहले राज्य सेवा छोड़ समाज सेवा में आ गए थे शास्त्री
वह ग्रेजुएशन के बाद जयपुर राज्य सेवा में शामिल हो गए और गृह एवं विदेश विभाग में सचिव के पद तक पहुंचे. लेकिन 1927 में उन्होंने इस्तीफा दे दिया और समाजसेवा से जुड़ गए. इसी साल 'जीवन कुटीर' संगठन की स्थापना की और समर्पित सामाजिक कार्यकर्ताओं के एक समूह को प्रशिक्षित किया. कुछ साल बाद 25 अप्रैल 1935 को उनकी बेटी का निधन हो गया. करीब 5 महीने बाद 6 अक्टूबर, 1935 को टोंक जिले की निवाई में श्रीशान्ता बाई शिक्षा-कुटीर की स्थापना की और यही शिक्षा-कुटीर बाद में वनस्थली विद्यापीठ के रुप में विकसित हुई. हालांकि शुरुआत में वनस्थली में शिक्षण कार्य के लिए न कोई अपनी भूमि थी, न कोई भवन, न रुपया-पैसा. लेकिन शास्त्री के संकल्प के चलते आज यह सबसे बड़ी गर्ल्स यूनिवर्सिटी हैं.
संविधान सभा के सदस्य भी रहे पूर्व मुख्यमंत्री
इसके बाद वह राजनीति की तरफ आकर्षित हुए. उन्हें 1937 में जयपुर राज्य प्रजा मंडल को पुनर्गठित करने के लिए तैयार किया गया, जिसके वे दो बार महासचिव और दो बार अध्यक्ष चुने गए. 1939 में उन्होंने नागरिक स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिए प्रजा मंडल के सत्याग्रह का नेतृत्व किया और छह महीने की कैद भी हुई. 1947 में उन्हें ऑल इंडिया स्टेट्स पीपुल्स कॉन्फ्रेंस का महासचिव नियुक्त किया गया. उसी वर्ष वे संविधान सभा के लिए चुने गए.
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