राजस्थान पंचायत चुनाव को लेकर सरकार और निर्वाचन आयोग में टकराव की स्थिति, कोर्ट जा सकती है राज्य सरकार

निर्वाचन आयोग ने सरकार से कहा है कि कोर्ट के आदेश के पालन में सभी सीटों का आरक्षण तय कर आयोग को सूचित किया जाए ताकि चुनाव कार्यक्रम घोषित किया जा सके.

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Rajasthan Panchayat Elections: राजस्थान में पंचायत चुनाव को लेकर सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग के बीच टकराव की स्थिति बनती दिखाई दे रही है. एक तरफ राज्य निर्वाचन आयोग है जो हाई कोर्ट के आदेश के तहत समय पर चुनाव कराने की तैयारी चाहता है, तो दूसरी तरफ राज्य सरकार है जो ओबीसी आरक्षण तय करने के लिए आयोग की रिपोर्ट का इंतजार कर रही है. ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि क्या पंचायत चुनाव समय पर होंगे या फिर सरकार कोर्ट से समय मांगेगी.

राजस्थान में पंचायत चुनाव को लेकर राज्य सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग के बीच खींचतान खुलकर सामने आ गई है. निर्वाचन आयोग ने सरकार से कहा है कि कोर्ट के आदेश के पालन में सभी सीटों का आरक्षण तय कर आयोग को सूचित किया जाए ताकि चुनाव कार्यक्रम घोषित किया जा सके. लेकिन राज्य सरकार ने आयोग को जवाब देते हुए कहा है कि अभी तक ओबीसी आयोग की रिपोर्ट तैयार नहीं हुई है. ऐसे में पंचायत चुनाव के लिए आरक्षण का निर्धारण करना संभव नहीं है.

आरक्षण के बिना चुनाव कराने पर SC ने सुनाया था फैसला

निर्वाचन आयोग ने अपने पत्र में मध्य प्रदेश के एक मामले का भी जिक्र किया है. सुप्रीम कोर्ट ने 2021 में अपने फैसले में कहा था कि अगर ओबीसी आरक्षण तय नहीं होता है तो ऐसी सीटों को सामान्य मानते हुए चुनाव कराए जा सकते हैं. इसी आधार पर आयोग चाहता है कि कोर्ट के आदेश की अवमानना से बचने के लिए सरकार सीटों का आरक्षण तय कर चुनाव की प्रक्रिया आगे बढ़ाए. दरअसल राजस्थान हाईकोर्ट ने पंचायत चुनाव 15 अप्रैल तक कराने के निर्देश दिए थे. चुनाव कराने से पहले अलग-अलग वर्गों के लिए सीटों का आरक्षण तय करना जरूरी होता है. आरक्षण तय किए बिना राज्य निर्वाचन आयोग चुनाव कार्यक्रम जारी नहीं कर सकता.

झाबर सिंह खर्रा ने बताया सरकार क्या चाहती

यूडीएच मंत्री झाबर सिंह खर्रा ने बताया कि राज्य सरकार की मंशा पंचायती राज चुनाव कराने की है और इसके लिए आवश्यक तैयारियां की जा रही हैं. उन्होंने कहा कि ओबीसी आरक्षण से जुड़ी रिपोर्ट आने के बाद आगे की प्रक्रिया को अंतिम रूप दिया जाएगा और चुनावों की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएंगे. उन्होंने विश्वास जताया कि प्रदेश में लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने के लिए समय पर चुनाव कराना सरकार की प्राथमिकता है.

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सरकार का कहना है कि ओबीसी आरक्षण का निर्धारण ओबीसी आयोग की रिपोर्ट के आधार पर ही होगा. इसलिए रिपोर्ट आने से पहले आरक्षण तय करना संभव नहीं है. दूसरी तरफ ओबीसी आयोग का कहना है कि पंचायतवार जनसंख्या के स्पष्ट आंकड़े और एससी-एसटी आरक्षण से जुड़ी पूरी जानकारी सरकार की ओर से समय पर उपलब्ध नहीं कराई गई है. इसी वजह से अभी तक रिपोर्ट तैयार नहीं हो पाई है. यूडीएच मंत्री ने सदन में यह भी कहा कि अगर कांग्रेस लिखकर दे कि बिना ओबीसी आयोग की रिपोर्ट के चुनाव करवा लिए जाएं तो सरकार यही जवाब कोर्ट में दे देगी.

21 जिलों की जिला परिषदों और पंचायत समितियों का कार्यकाल पूरा

असल में राज्य में पंचायत प्रतिनिधियों का कार्यकाल कई जगह खत्म हो चुका है. 21 जिलों की जिला परिषदों और पंचायत समितियों का कार्यकाल पूरा हो चुका है और सरकार ने वहां जिला कलेक्टर को प्रशासक नियुक्त कर रखा है. इनमें जैसलमेर, उदयपुर, बाड़मेर, अजमेर, पाली, भीलवाड़ा, राजसमंद, नागौर, बांसवाड़ा, बीकानेर, बूंदी, चित्तौड़गढ़, चूरू, डूंगरपुर, हनुमानगढ़, जालोर, झालावाड़, झुंझुनूं, प्रतापगढ़, सीकर और टोंक शामिल हैं.

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12 जिलों में पंचायतों का कार्यकाल अभी बाकी

वहीं 12 जिलों में पंचायतों का कार्यकाल अभी बाकी है, जिनमें भरतपुर, दौसा, जयपुर, जोधपुर, सवाई माधोपुर, सिरोही, अलवर, धौलपुर, बारां, करौली, कोटा और श्रीगंगानगर शामिल हैं. इसी बीच खैरथल तिजारा, फलोदी, डीग और कोटपूतली बहरोड़ जैसे नए जिलों के गठन के कारण भी प्रशासनिक स्थिति और जटिल हो गई है.

कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने आरोप लगाया कि सरकार की मंशा पंचायत चुनाव कराने की नहीं है और ओबीसी आयोग सरकार के इशारे पर काम कर रहा है.

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राजनीतिक और कानूनी पेचीदगियों के बीच अब यह माना जा रहा है कि राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका यानी एसएलपी दायर कर सकती है और ओबीसी आरक्षण तय करने के लिए समय मांग सकती है. ऐसे में अब सबकी नजर इस बात पर है कि पंचायत चुनाव समय पर होते हैं या फिर यह मामला एक बार फिर अदालत की चौखट पर पहुंचता है.

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