Rajasthan News: राजस्थान हाईकोर्ट ने पूर्व मंत्री महेश जोशी की गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली उनके बेटे रोहित जोशी की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (हैबियस कॉर्पस) भले ही खारिज कर दी हो, लेकिन अपने विस्तृत आदेश में एसीबी (ACB) और स्पेशल जज (Special Judge) की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं. जस्टिस उमाशंकर व्यास और जस्टिस अशोक कुमार जैन की बेंच ने 12 जून को याचिका खारिज की थी, जिसका विस्तृत आदेश बुधवार को जारी हुआ. कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि गिरफ्तारी के दौरान संवैधानिक प्रावधानों का पालन नहीं किया गया और एसीबी तथा विशेष अदालत (Special Court) दोनों स्तरों पर गंभीर चूक हुई.
स्पेशल जज के आदेश को चुनौती
हाईकोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के स्थापित सिद्धांतों के अनुसार, जब कोई व्यक्ति न्यायिक आदेश के तहत हिरासत में हो, तब हैबियस कॉर्पस याचिका के माध्यम से गिरफ्तारी को अवैध घोषित नहीं किया जा सकता. हालांकि, याचिकाकर्ता को स्पेशल जज के आदेश को विधि अनुसार चुनौती देने की स्वतंत्रता दी गई है.
कोर्ट ने कहा कि किसी भी गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में बताना संविधान के आर्टिकल 22(1) के तहत अनिवार्य है. एसीबी ऐसा कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सकी जिससे यह साबित हो सके कि महेश जोशी को गिरफ्तारी के वास्तविक आधार बताए गए थे. कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल धाराएं बताना पर्याप्त नहीं है. “गिरफ्तारी के आधार” (grounds of arrest) और “गिरफ्तारी के कारण” (reasons of arrest) अलग-अलग अवधारणाएं हैं, जिन्हें एसीबी समझने में विफल रही.
हाईकोर्ट ने एसीबी के जवाबों में विरोधाभास भी दर्ज किया. पहले एसीबी ने कहा कि आरोपी को गिरफ्तारी के आधार बताए गए, बाद में कहा गया कि यह जानकारी परिवार को दी गई थी. कोर्ट ने इसे गंभीर विसंगति माना और बाद में दाखिल जवाब में तथ्यों के जोड़े जाने को प्रथम दृष्टया हेरफेर बताया.
स्पेशल जज की भूमिका पर भी टिप्पणी
बेंच ने एसीबी के साथ-साथ स्पेशल जज की भूमिका पर भी टिप्पणी की. अदालत ने कहा कि 7 मई को ही रिमांड के दौरान गिरफ्तारी की वैधता पर आपत्ति उठाई गई थी, ऐसे में न्यायाधीश का दायित्व था कि उसी समय इस पर निर्णय लेते, लेकिन आवेदन को लंबित रखकर लगभग 31 दिन बाद खारिज किया गया, जो उचित नहीं था.
हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य में पुलिस और न्यायिक अधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और संवैधानिक प्रावधानों के पालन को लेकर प्रशिक्षण दिए जाने की आवश्यकता है. इससे शुरुआती स्तर पर ही नागरिकों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित हो सकेगी. अदालत ने अपने आदेश की प्रति हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को भेजने के निर्देश दिए हैं, ताकि इसे मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखा जा सके. साथ ही, एसीएस होम को भी आदेश की प्रति भेजने को कहा गया है ताकि आवश्यक कार्रवाई की जा सके.
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