जैसलमेर में तिरंगा यात्रा की अनुमति को लेकर शुरू हुआ विवाद अब राजनीतिक रंग लेता नजर आ रहा है. अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के कार्यकर्ता सोमवार (27 जुलाई) शाम से शहर कोतवाली के बाहर धरने पर बैठे हैं. संगठन का आरोप है कि तिरंगा यात्रा की अनुमति लेने पहुंचे कार्यकर्ताओं के साथ पुलिस ने धक्का-मुक्की की और अभद्र व्यवहार किया. एबीवीपी ने शहर कोतवाली के थानाधिकारी सूरजाराम जाखड़ और एक हेड कांस्टेबल को निलंबित करने की मांग की है. एसपी अभिषेक शिवहरे का कहना है कि 26 जुलाई को एबीवीपी के कार्यकर्ता करीब 11 मिनट तक शहर कोतवाली में मौजूद थे. नियमानुसार उसी दिन दोपहर 3 बजकर 21 मिनट पर तिरंगा यात्रा की अनुमति जारी कर दी गई थी. उन्होंने कहा कि अनुमति मिलने के बाद यात्रा शांतिपूर्वक निकाली गई और पुलिस को इस मामले में कोई लिखित शिकायत या ज्ञापन प्राप्त नहीं हुआ है.
NSUI पुलिस के समर्थन में उतरी
विवाद के बीच सोशल मीडिया पर विद्यार्थी परिषद को जारी अनुमति पत्र भी वायरल हो रहा है. पत्र में अनुमति का आधार पुलिस की रिपोर्ट को बताया गया है. इसके बाद यह सवाल भी उठने लगे हैं कि यदि अनुमति जारी कर दी गई थी तो फिर विवाद की स्थिति क्यों बनी?
इसी मुद्दे पर राष्ट्रीय छात्र संघ (NSUI) ने प्रेस नोट जारी कर ABVP के आरोपों को भ्रामक बताया है. NSUI का कहना है कि तिरंगा यात्रा की अनुमति पुलिस और प्रशासन ने नियमों के अनुसार दी थी. संगठन ने पुलिस के समर्थन में रैली निकालने का भी ऐलान किया है.
पुलिस ने धक्का-मुक्की के आरोप से किया इनकार
वहीं, शहर कोतवाली के थानाधिकारी सूरजाराम जाखड़ ने सभी आरोपों को निराधार बताया. उन्होंने कहा कि ABVP के कार्यकर्ता तिरंगा यात्रा की अनुमति के लिए थाने आए थे. उन्हें बताया गया कि नियमानुसार अंतिम अनुमति एसडीएम (SDM) से जारी होती है और इसके लिए वहां से अनुमति लानी होगी. पुलिस अधिकारी ने कहा, "पुलिस ने अपनी ओर से पूरी मदद की और आवश्यक प्रक्रिया पूरी की. किसी भी कार्यकर्ता के साथ अभद्रता या धक्का-मुक्की जैसी कोई घटना नहीं हुई. सभी आरोप पूरी तरह गलत हैं."
पुलिस अधिकारी के समर्थन में शेयर किया पोस्ट
विवाद के बीच सोशल मीडिया पर भी मामला गरमाया हुआ है. कई स्थानीय लोगों ने एसएचओ सूरजाराम जाखड़ के समर्थन में पोस्ट साझा किए हैं. इन पोस्टों में लिखा गया है, "उनके कार्यकाल में शहर की कानून-व्यवस्था मजबूत हुई है और एक ईमानदार पुलिस अधिकारी का मूल्यांकन उसके कार्यों के आधार पर होना चाहिए, न कि व्यक्तिगत रंजिश या निराधार आरोपों के आधार पर."
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