गांव का नाम किसी व्यक्ति के नाम पर नहीं रख सकते, सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार और हाईकोर्ट के आदेश किए रद्द

सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला देते हुए कहा कि किसी भी राजस्व गांव का नाम व्यक्ति, धर्म या जाति के नाम पर नहीं रखा जा सकता. कोर्ट ने राज्य सरकार की अधिसूचना और हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर संविधान के अनुच्छेद 14 का हवाला दिया.

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सुप्रीम कोर्ट.

Rajasthan News: सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम मामले में फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि किसी भी राजस्व गांव का नाम किसी व्यक्ति धर्म जाति या उपजाति से जोड़कर नहीं रखा जा सकता.

यह फैसला गांवों के नामकरण में सरकारी नीतियों की सख्ती से पालन सुनिश्चित करेगा और मनमाने फैसलों पर रोक लगाएगा. न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने यह आदेश जारी किया जिससे पूरे देश में गांवों के नाम रखने के नियमों पर नई बहस छिड़ सकती है.

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सरकार की अपील पर मिली थी मंजूरी

मामला राजस्थान के बाड़मेर जिले से जुड़ा है जहां सोडा ग्राम पंचायत क्षेत्र में दो नए राजस्व गांव बनाए गए थे. इनका नाम अमरगढ़ और सगतसर रखा गया जो अमराराम और सगत सिंह नामक दो व्यक्तियों के नाम पर आधारित थे.

इन दोनों ने गांव बनाने के लिए अपनी निजी जमीन दान की थी. राज्य सरकार ने 31 दिसंबर 2020 को इसकी अधिसूचना जारी की. लेकिन भीकाराम और अन्य लोगों ने इसे राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी.

सुप्रीम कोर्ट ने रद्द किए आदेश

हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने 11 जुलाई 2025 को अधिसूचना को रद्द कर दिया. फिर सरकार की अपील पर डिवीजन बेंच ने 5 अगस्त 2025 को सिंगल बेंच के फैसले को पलट दिया. इसके बाद याचिकाकर्ता सुप्रीम कोर्ट पहुंचे. सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई में राज्य सरकार की अधिसूचना और हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के आदेश दोनों को रद्द कर दिया.

सरकार नीति से अलग फैसला नहीं ले सकती

कोर्ट ने जोर देकर कहा कि सरकार अपनी तय नीति से अलग जाकर कोई फैसला नहीं ले सकती. अगर नीति में बदलाव किए बिना अधिसूचना जारी की जाती है तो इसे मनमानी माना जाएगा जो संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है. कोर्ट ने 20 अगस्त 2009 के सरकारी सर्कुलर का हवाला दिया जिसमें स्पष्ट है कि गांवों के नाम व्यक्ति धर्म जाति या उपजाति से जुड़े नहीं होने चाहिए. जहां तक हो सके नाम स्थानीय लोगों की राय से तय किया जाए.

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सरकार की तरफ से दलील दी गई कि नए गांव बनाने में कानूनी प्रक्रिया का पालन किया गया और 2009 का सर्कुलर सिर्फ मार्गदर्शक है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे नामंजूर कर दिया और अधिसूचना को पूरी तरह निरस्त कर दिया.