Rajasthan News: राजस्थान का राज्य वृक्ष और मरुधरा की पहचान 'खेजड़ी' इस वक्त एक बड़े सियासी और सामाजिक संघर्ष का केंद्र बन गया है. मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने खेजड़ी को 'कल्पवृक्ष' का दर्जा देकर इसके संरक्षण के लिए विधानसभा में नया कानून (Bill) लाने का वादा किया है. इसके बावजूद बीकानेर की बिश्नोई धर्मशाला के बाहर हजारों लोग डटे हुए हैं. आखिर क्या वजह है कि सरकार के तमाम प्रयासों के बाद भी यह आंदोलन खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है?
1. संतों की दूरी, दो धड़ों में बंटा आंदोलन
ताजा हालातों की बात करें तो मुख्यमंत्री से मुलाकात और आश्वासन के बाद संतों का एक धड़ा पीछे हट चुका है, लेकिन आम जनता और पर्यावरण प्रेमियों का गुस्सा अब भी सातवें आसमान पर है. जमीनी स्तर पर लड़ रहे कार्यकर्ताओं को लगता है कि उनके साथ 'सियासी खेल' हुआ है. इसीलिए मंत्री के.के. बिश्नोई के मंच से सरकार का पक्ष रखने के बाद जनता ने उसे अधूरा समाधान मानकर खारिज कर दिया है. इस तरह ये आंदोलन दो धड़ों में बंट गया है.

मुख्यमंत्री निवास पर सीएम भजनलाल से मिले साधु संत.
2. महिलाओं की रहीं 'क्रमिक भूख हड़ताल'
2 फरवरी से बीकानेर में आंदोलनकारी मैदान में डटे हुए हैं. क्रमिक भूख हड़ताल भी चल रही है, जहां 50 लोग बारी-बारी से रोजाना अन्न त्यागते हैं. इसमें बड़ी संख्या में महिलाएं शामिल हैं, जिन्होंने मोर्चा संभाल रखा है. उनके भावुक बयान और खेजड़ी के प्रति लगाव ने इसे एक 'इमोशनल जन-आंदोलन' बना दिया है. आलम यह है कि धरना स्थल पर एक समय में 2 से 3 हजार लोग मौजूद रहते हैं, जो राजस्थान के कोने-कोने से खेजड़ी बचाने के लिए पहुंचे हैं.

महिलाओं ने संभाला 'खेजड़ी बचाओ आंदोलन' का मोर्चा.
Photo Credit: IANS
3. सोलर प्रोजेक्ट्स बनाम पर्यावरण का पेच
पश्चिमी राजस्थान अब देश का 'सोलर हब' बन चुका है. अकेले इस क्षेत्र में 45,000 एकड़ भूमि सोलर कंपनियों को आवंटित की जा चुकी है. आंदोलनकारियों का आरोप है कि सोलर प्लांट लगाने के नाम पर 200 से लेकर 500-500 पेड़ एक साथ काटे जा रहे हैं. सरकार के सामने एक तरफ क्लीन एनर्जी का लक्ष्य है, तो दूसरी तरफ पर्यावरण और विरासत को बचाने की चुनौती. डिप्टी सीएम प्रेमचंद बैरवा का कहना है कि सरकार समाधान निकाल रही है, लेकिन जमीन पर पेड़ों की कटाई रुकने तक आंदोलनकारी मानने को तैयार नहीं हैं.
सरकार का पक्ष: खेजड़ी को आंच नहीं आने देंगे
डिप्टी सीएम प्रेमचंद बैरवा और राज्य मंत्री के. के. बिश्नोई ने आंदोलनकारियों के बीच पहुंचकर सरकार का रुख स्पष्ट किया है. बैरवा ने कहा, 'हमारे मुख्यमंत्री किसी भी कीमत पर खेजड़ी काटने के पक्ष में नहीं हैं. हम जल्द ही विधानसभा में सख्त कानून लाएंगे. मामला संज्ञान में आते ही संतों को पुख्ता आश्वासन दिया गया है और प्रभावी समाधान निकाला जा रहा है.'
खेजड़ी केवल एक वृक्ष नहीं, राजस्थान के त्याग, शौर्य और जीवंतता का प्रतीक है। 'विकास भी, विरासत भी' के संकल्प के साथ हमारी सरकार अब खेजड़ी के संरक्षण के लिए सशक्त कानून लाएगी। हम अपनी जड़ों को सुरक्षित कर, आने वाली पीढ़ियों को एक हरा-भरा और समृद्ध प्रदेश सौंपने हेतु प्रतिबद्ध हैं। pic.twitter.com/Gr4dsPWGI0
— Bhajanlal Sharma (@BhajanlalBjp) February 5, 2026
4. विपक्ष की लामबंदी और सियासी 'तड़का'
भजनलाल सरकार के लिए यह मुद्दा इसलिए भी भारी है क्योंकि इसमें अशोक गहलोत और वसुंधरा राजे जैसे दोनों पूर्व मुख्यमंत्रियों ने सुर मिलाया है. वसुंधरा राजे का ट्वीट और गहलोत का बयान यह दर्शाता है कि यह मुद्दा अब सीधे सरकार की साख से जुड़ गया है. देवी सिंह भाटी और भंवर सिंह भाटी जैसे स्थानीय दिग्गजों की सक्रियता ने सरकार की घेराबंदी और मजबूत कर दी है.
“सिर साँठे रूंख रहे तो भी सस्तो जाण"
— Vasundhara Raje (@VasundharaBJP) February 3, 2026
खेजड़ी साधारण पेड़ नहीं, यह हमारे लिए देववृक्ष है। जो हमारी आस्था और भावनाओं से जुड़ा है। हमारे यहाँ खेजड़ी की पूजा की जाती हैं। मैं स्वयं भी खेजड़ी की पूजा करती हूँ। जिसकी हम पूजा करें, उस देवता का संरक्षण हमारा दायित्व है।
राजनीति से ऊपर… pic.twitter.com/1ZyMVC8T5W
राजस्थान की पहचान और बिश्नोई समाज सहित समस्त प्रदेशवासियों की आस्था के प्रतीक 'खेजड़ी' को बचाने के लिए बीकानेर में चल रहा आंदोलन अब जन-आंदोलन का रूप ले चुका है।
— Ashok Gehlot (@ashokgehlot51) February 4, 2026
विकास के नाम पर हज़ारों खेजड़ी के पेड़ों की निर्मम कटाई बेहद दुखद है। श्रीमती अमृता देवी बिश्नोई सहित सभी 363 शहीदों…
5. अड़चन कहां है? क्यों नहीं मान रहे आंदोलनकारी?
आंदोलन के प्रमुख चेहरे राम सिंह बिश्नोई ने साफ कर दिया है कि वे उन्हें केवल संभागीय आयुक्त का पत्र या मुख्यमंत्री का मौखिक आश्वासन नहीं चाहिए. उनकी मांग है कि प्रमुख शासन सचिव (ACS) के स्तर से पूरे राजस्थान के लिए एक ठोस लिखित आदेश जारी हो. जब तक लिखित आदेश नहीं मिलता, तब तक धरना चलता रहेगा. इसके साथ ही अब तक जिन जगहों पर पेड़ काटे गए हैं, उन दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई भी की जानी चाहिए. यह आंदोलन अब जन आंदोलन का रूप ले चुका है और यही वजह है कि यह भजनलाल सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है.
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