पश्चिमी राजस्थान में विकास के नाम पर पर्यावरण के विनाश को रोकने के लिए जो जन आंदोलन हो रहा है वह कई मायनों में बेहद अहम है. सोलर प्लांट्स के लिए राजस्थान के राज्य वृक्ष खेजड़ी के पेड़ों की प्रस्तावित कटाई को रोकने के लिए लोग डटे हुए हैं. इस आंदोलन की परम्परागत सामाजिक शक्ति खेजड़ी के पेड़ों की पूजा करने वाला बिश्नोई समुदाय है, लेकिन अब इसमें आसपास के जिलों और पड़ोसी राज्यों के पर्यावरण प्रेमी भी शामिल हो रहे हैं.
बीकानेर ज़िला मुख्यालय में 2 फ़रवरी को लगभग 90 हज़ार लोगों का जुटान हुआ. बाद में कुछ लोगों ने आमरण अनशन शुरू किया. विधानसभा में मुख्यमंत्री भजनलाल को घोषणा करनी पड़ी कि बजट सत्र के बाद खेजड़ी के पेड़ों की कटाई रोकने के लिए विधेयक निर्माण का प्रस्ताव लाया जाया जाएगा. इसके बाद आमरण अनशन तो ख़त्म कर दिया गया, लेकिन अभी लोग धरने पर डटे हुए हैं. आंदोलनकारियों का कहना है कि जब तक क़ानून वास्तव में बन नहीं जाता, वे क्रमिक धरने पर बैठे रहेंगे.
सौर ऊर्जा को स्वच्छ और हरित ऊर्जा माना जाता है. इसे कम ख़र्चीला और वहनीय ऊर्जा का स्रोत भी माना गया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक प्रिय परियोजना सौर ऊर्जा के विस्तार की भी है. इसके लिए उन्होंने एक अंतर्राष्ट्रीय सौर ऊर्जा गठबंधन भी बनाया है. यह अंतरराष्ट्रीय संगठन अभी चर्चा में इसलिए भी आया था कि अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने कुछ ही दिन पहले इस गठबंधन से किनारा कर लिया था.

खेजड़ी वृक्ष
सौर ऊर्जा की कीमत चुकाते वृक्ष
यह एक सर्वस्वीकृत तथ्य है कि पश्चिमी राजस्थान की भौगोलिक और जलवायविक परिस्थितियां सौर ऊर्जा के लिए बहुत अनुकूल हैं. लेकिन इसकी क़ीमत कठोर भौगोलिक परिस्थितियों में वहाँ के लोगों की जीवनरेखा रहे खेजड़ी के असंख्य पेड़ों के बलिदान से चुकाई जाने की योजना है. बाड़मेर, जैसलमेर और बीकानेर में प्रस्तावित सोलर प्लांट्स के लिए क़रीब 50 लाख खेजड़ी के वृक्षों की कटाई का अनुमान है. निर्दलीय विधायक रविंद्र सिंह भाटी ने प्रदर्शनकारियों के बीच पहुंचकर यह दावे किए. वहीं राजस्थान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली और सदन के बाहर राजस्थान कांग्रेस के अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने भी इस मुद्दे पर अपनी बात रखी.
उन्होंने राजस्थान विधानसभा में भी इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया है. उनका आरोप है कि सोलर प्लांट्स की बड़े पैमाने पर स्थापना की समूची प्रक्रिया में सत्ताधारी राजनीतिक दल के कई बड़े नेताओं को सीधा आर्थिक लाभ मिलने वाला है, और यही कारण है कि आंदोलनकारियों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों के बीच इस मुद्दे को लेकर टकराव की स्थितियां बनी हुई है.
सत्ताधारी दल के कई स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने खेजड़ी की रक्षा के लिए आंदोलनकारियों के प्रति अपना समर्थन व्यक्त किया है. जबकि, राज्य का शीर्ष नेतृत्व और कुछ शक्तिशाली नेता जिनकी दिल्ली तक अच्छी पकड़ है, वे इस मुद्दे पर कोई सार्वजनिक बयान देने से बचते रहे.

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पर्यावरण प्रेमियों और आंदोलनकारियों की एकजुटता और प्रतिबद्धता के कारण यह मुद्दा राजनीतिक गलियारों में चर्चा का अहम बिंदु बना. राज्य स्तरीय मीडिया ने भी इस मुद्दे पर विस्तार से रिपोर्टिंग की है, जिसका नतीजा हुआ कि आनन फ़ानन में प्रमुख राजनीतिक दलों को अपना रुख़ स्पष्ट करना पड़ा. पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और वसुंधरा राजे ने भी इस आंदोलन के प्रति अपनी सहानुभूति और समर्थन व्यक्त किया है. जबकि, भाजपा का राज्यस्तरीय शीर्ष नेतृत्व पहले पहल इसे नज़रअंदाज़ करता रहा.
बाद में, पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार पर ठीकरा फोड़ दिया कि सोलर प्लांट्स की सारी योजना कांग्रेस के पिछले शासनकाल में बन गई थी. आंदोलनकारी तब भी गोलबंद होते रहे. इसके बाद मुख्यमंत्री भजनलाल को विधानसभा में “पेड़ संरक्षण अधिनियम” बनाने की घोषणा करनी पड़ी.
जयपुर के एक शिक्षण संस्थान में सत्ताधारी दल के छात्र संगठन के एक पदाधिकारी स्थानीय राजनीतिक समीकरण और सामुदायिक चेतना के कारण खेजड़ी बचाओ आंदोलन से जुड़े हुए हैं. नाम ज़ाहिर नहीं करने की शर्त पर वो बताते हैं, “यह आंदोलन सिर्फ़ बिश्नोई समुदाय का नहीं है, जैसा कि बाहर दिखाया जा रहा है. बल्कि, इसमें सभी विचारधारा के पर्यावरणप्रेमी एकजुट होकर भागीदारी कर रहे हैं. इसमें कुछ ऐसे संत भी शामिल हैं जो पर्यावरण की रक्षा के लिए चिंतित हैं.”

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खेजड़ी से भावनात्मक रिश्ता
पश्चिमी राजस्थान में बिश्नोई समुदाय का खेजड़ी से एक भावनात्मक संबंध भी है. 1730 में खेजड़ी की रक्षा में अमृता देवी बिश्नोई की शहादत हुई थी. साथ ही, तत्कालीन रियासत के शासन के दौरान 264 लोगों ने जिनमें 193 में महिलाएं और 69 पुरुषों को भी मौत के घाट उतार दिया. बिश्नोई समाज की सामुदायिक स्मृति में आज भी यह गाथा ताज़ा है. बिश्नोई समुदाय के बच्चे अमृता देवी की इस शहादत के बारे में कहानियाँ सुनते हुए बड़े होते हैं.
छप्पनिया के काल में खेजड़ी के छोड़े (छाल) खाकर अपने दिनों को काटने की बहुत सी कहानियां रेगिस्तानी लोक में रची बसी है. फिर, खेजड़ी के पेड़ पश्चिमी राजस्थान के सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन की भी बुनियाद हैं. कठोर जीवन परिस्थितियों के बीच इसके फल स्वादिष्ट सब्ज़ी देते हैं. पानी की क़िल्लत को कम करते हैं. मरुस्थलीकरण को रोकते है. भीषण उच्च तापमान में जहाँ अन्य पेड़ पौधे नष्ट हो जाते हैं, खेजड़ी के पेड़ हवा और छाँव से सुकून देते हैं.
खेजड़ी राजस्थान का राज्य वृक्ष है जिसकी कटाई पर 100 रुपए का मामूली जुर्माना भी है. वर्तमान आंदोलनकारियों का तर्क है कि इस दर के जुर्माने से सोलर प्लांट्स लगाने वाली कंपनियां समूचे पेड़ काट डालेंगी. इसलिए उनकी माँग सख़्त क़ानून बनाते हुए खेजड़ी की कटाई को पूर्णतः प्रतिबंधित करने की है.

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विकास बनाम पर्यावरण विनाश को रोकने के संघर्ष में जब इस आंदोलन को देखते हैं तो ऐसी आशंका होती है कि सोलर प्लांट्स की यह परियोजना भी अन्य उद्योगों की तरह स्थानीय लोगों के लिए बर्बादी का कारण बन सकती है. यह विकट तथ्य स्थानीय समुदाय की समझ में भी आ गया है. इसीलिए वे आंदोलित भी हैं.
विकास की किसी भी नीति में पर्यावरण विनाश और स्थानीय लोगों के जीवन और जन संस्कृति की आपराधिक उपेक्षा एक प्रचलित रणनीति है. खेजड़ी बचाने का यह आंदोलन अगर सफल हुआ तो संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर में वर्णित पर्यावरण के अधिकार का ही सम्मान होगा. साथ ही, देश के अन्य हिस्सों में चल रहे पर्यावरण आधारित आंदोलन के लिए प्रेरणास्रोत होगा. संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा पर्यावरणीय अधिकारों की घोषणा में स्थानीय पर्यावरण की रक्षा के संकल्प को आत्मसात किया गया है. पर्यावरण के अधिकार को मानवाधिकार के बतौर मान्यता दी गई है और भारत ने भी इस समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं.
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लेखक परिचयः दीपक चारण राजस्थान के इतिहास, कला - संस्कृति, समाज एवं साहित्य के गंभीर अध्येता हैं. उन्होंने हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय जयपुर में विकास संचार विषय का अध्ययन किया है.
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं.