
एक तरफ जहां प्रवेशोत्सव अभियान, सर्वशिक्षा अभियान, सब पढ़ें-सब बढ़ें का ढिढोरा पीटा जा रहा है, लेकिन कच्ची बस्ती व घुमंतु जातियों के बच्चे आज भी शिक्षा से वंचित है. सबसे शर्मनाक बात यह है कि जिला मुख्यालय पर ही अस्थाई बसेरों में रहने वाले परिवारों के लगभग 150 बच्चे किशोरावस्था तक पहुंचने के बावजूद स्कूल की चौखट तक नहीं देखी और भंगार आदि बीनने को मजबूर हैं, लेकिन इस ओर न तो शिक्षा विभाग कोई ध्यान दे रहा है और न ही राज्य सरकार द्वारा ऐसे बच्चों को शिक्षा से जोड़ने के लिए कोई नीति बनाई गई है.
मजदूरी की तलाश में भटकते परिवार
दरअसल, बांसवाड़ा जिला मुख्यालय पर कॉलेज मैदान, ओजरिया बायपास, दाहोद रोड सहित अन्य स्थानों पर अस्थाई बसेरों में रहने वाले घुमंतू परिवारों के डेरे हैं. इन डेरों में कई परिवार रह रहे हैं. इन परिवारों के कई बच्चों ने अब तक स्कूल में कदम तक नहीं रखा है. डेरे से निकलकर कभी भंगार बुनना और कभी छोटा-मोटा काम कर लेना इनकी नियति बन गई है. परिवार का स्थाई ठिकाना नहीं होने और मजदूरी की तलाश में भटकते रहने से इन डेरों में रहने वाले बच्चे कभी शिक्षा से जुड़े ही नहीं हैं.
बता दें कि उच्च शिक्षा के मंदिर कॉलेज के सामने लगे डेरों में कई ऐसे बच्चे मिले, जो कभी स्कूल नहीं गए और आज भी शिक्षा से वंचित है.
बच्चे कभी नहीं जा पाये स्कूल
इन डेरों में रहने वाले परिवार के एक सदस्य धर्मेन्द्र से बातचीत की तो उन्होंने कहा कि कौन सी और कैसी शिक्षा? हमारा कोई स्थायी ठिकाना नहीं है. वर्षों से जिले में ही रह रहे हैं. पहले भचड़िया में रहते थे. वहां कुछ जमीन भी ली, लेकिन उसमें पानी भर जाता है. ऐसे में रोजगार के लिए यहीं डेरे में रहते हैं. धर्मेन्द्र ने अपना दर्द बताते हुए कहा कि परिवार व रिश्तेदारी में करीब 100-150 बच्चे हैं, जो कभी स्कूल नहीं गए. शिक्षा नहीं मिलने से मासूम बच्चों का जीवन अंधकारमय होता जा रहा है. कई बच्चे जवानी की दहलीज पर हैं तो कई बच्चियों की शादी भी करा दी गई. आज तक इन्हें अक्षर का ज्ञान भी नहीं हुआ.
आधार कार्ड के अलावा इनके पास नहीं है कोई दस्तावेज
बता दें कि इन डेरों में रहने वाले परिवारों के पास चाइल्ड लाइन की टीम भी पहुंची. समन्वयक परमेश पाटीदार के अनुसार, टीम के कमलेश बुनकर व बसुड़ा कटारा ने परिजनों से बातचीत भी की. शिक्षा से वंचित परिवारों ने बताया कि लंबे समय से यहीं रह रहे हैं. प्रशासनिक सख्ती पर दूसरी जगह चले जाते हैं. छोटे बच्चे डेरे और मैदान में ही रहते हैं. कुछ बच्चे भंगार बीनने निकल पड़ते हैं. कुछ बच्चों के पिता की मौत हो चुकी है. विधवाएं इन बच्चों को जैसे-तैसे पाल रही हैं. आधार कार्ड के अलावा कोई अन्य दस्तावेज नहीं हैं. इसके चलते सरकार की योजनाओं का लाभ कभी नहीं मिला है.
बंद हुई मोबाइल बस
कुछ सालों पहले शिक्षा विभाग की ओर से ऐसे बच्चों के लिए एक बस संचालित थी, जिस पर एक शिक्षक की ड्यूटी लगाई जाती थी. प्रोजेक्ट बंद होने के बाद यहां अब बस नहीं आती है.
बांसवाड़ा सीडीईओ शंभुलाल नायक ने कहा कि घुमंतू परिवार होने से इनके बच्चे चाइल्ड ट्रेकिंग सर्वे में सामने नहीं आ पाते हैं. यदि जिला मुख्यालय पर इन परिवारों के बच्चे शिक्षा से वंचित हैं तो इसकी जानकारी लेकर नामांकन कराने का प्रयास किया जाएंगा.