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च‍ित्‍तौड़गढ़ के इस महल में रात होते ही सुनाई देती है घुंघरू-ढोलक की आवाजें? बुजुर्गों ने बताया डरावना रहस्य

च‍ित्‍तौड़गढ़ के रहने वाले मजदूरों ने बताया क‍ि काम करते समय कुंभा महल से अवाजें सुनाई देती थीं, लेक‍िन आसपास कुछ नहीं द‍िखाई देता था. पढ़िए रहस्‍यमयी डरावनी आवाज की कहानी. 

च‍ित्‍तौड़गढ़ के इस महल में रात होते ही सुनाई देती है घुंघरू-ढोलक की आवाजें? बुजुर्गों ने बताया डरावना रहस्य

राजस्थान का गौरव चित्तौड़गढ़ दुर्ग अपनी वीरता के साथ-साथ अपने रहस्यों के लिए भी जाना जाता है. चित्तौड़गढ़ दुर्ग स्थित कुंभा महल में सुनाई देने वाली रहस्यमयी आवाजों को लेकर एक नई बहस छिड़ी हुई है. इसको लेकर एनडीटीवी ने जब चित्तौड़ दुर्ग निवासी के उन उम्र दराज बुजुर्गों से बात की जिन्होंने अपना बचपन इन दीवारों के साये में गुजारा है, तो ऐसे दावे सामने आए जो रोंगटे खड़े कर देने वाले हैं. 

चित्तौड़गढ़ दुर्ग का कुंभा महल वही स्थान है जहां, कभी महाराणा कुंभा का निवास था, और जहां की दीवारों ने जौहर की ज्वाला भी देखी है. स्थानीय लोगों के बीच लंबे समय से यह चर्चा रही है कि रात के सन्नाटे में यहां कुछ अजीब हलचलें होती हैं. इन चर्चाओं को बल तब मिला जब दुर्ग निवासी सबसे उम्र दराज 95 वर्षीय मोहनी देवी ने अपने अनुभव साझा किए.

 घुंघरुओं की झंकार...

मोहनी देवी उस जमाने की बात करते हुए एनडीटीवी से कहा, "मैं बचपन में कुंभामहल में काम करती थी. उस समय हमें दो आना मजदूरी मिलती थी. जब रात का वक्त होता, तो महल के भीतर से घुंघरुओं की झंकार, ढोलक की थाप और प्राचीन गीतों की आवाजें साफ सुनाई देती थीं. ऐसा लगता था जैसे कोई उत्सव चल रहा हो, लेकिन ताजुब की बात यह थी कि जब हम आवाज की दिशा में जाकर देखते, तो वहां कोई नजर नहीं आता था. सिर्फ सन्नाटा होता था, पर आवाजें फिर भी गूंजती रहती थीं. हम वहां कभी-कभी जाकर बैठते थे, तब भी अवाजें सुनाई देती थीं."

मोहनी देवी को घुंघरू और ढोलक की आवाज सुनाई देती थी.

मोहनी देवी को घुंघरू और ढोलक की आवाज सुनाई देती थी.

"वो आवाजें महल की रूह में बसी हुई महसूस होती थीं"

मोहनी देवी की बातों को केवल कोरी कल्पना नहीं कहा जा सकता, क्योंकि दुर्ग के ही एक अन्य बुजुर्ग, 83 वर्षीय मदन लाल माली ने भी इन रहस्यमयी घटनाओं की पुष्टि की है. मदन लाल माली ने अपना पूरा बचपन इसी कुंभामहल महल की सेवा और सफाई में बिताया है. मदन लाल माली एनडीटीवी से बातचीत करते हुए कहा, "मुझे याद है, मैं बचपन में कुंभा महल में पेड़-झाड़ियों की कटाई और सफाई का काम करता था. तब हमें 25 पैसा रोजाना मजदूरी मिलती थी. रात के समय माहौल एकदम बदल जाता था." 

उन्होंने कहा,  "कुंभा महल महल से अजीब आवाजें आती थीं. हम कई बार देखने गए कि आखिर कौन बोल रहा है, लेकिन वहां कोई इंसान मौजूद नहीं होता था. वो आवाजें महल की रूह में बसी हुई महसूस होती थीं. "

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मदन लाल माली ने बताया कि कुंभामहल महल से अजीब आवाजें आती थीं. 

कुंभा महल की ये आवाजें आज भी पहेली

इन दोनों प्रत्यक्षदर्शियों के दावे एक ही तरफ इशारा करते हैं कि चित्तौड़गढ़ की विरासत केवल पत्थरों तक सीमित नहीं है. विशेषज्ञों का मानना है कि ऐतिहासिक स्मारकों में अक्सर पुरानी ऊर्जाएं बची रह जाती हैं. हालांकि, विज्ञान इन्हें ध्वनि तरंगों का भ्रम मान सकता है, लेकिन मोहनी देवी और मदन लाल जैसे बुजुर्गों के लिए ये उनके जीवन के वे अनुभव हैं, जिन्हें उन्होंने खुद महसूस किया है. कुंभा महल की ये आवाजें आज भी एक अनसुलझी पहेली बनी हुई हैं. क्या यह केवल हवाओं का शोर है या सदियों पुराने इतिहास की कोई गूंज जो आज भी इन खंडहरों में भटक रही है? सच्चाई जो भी हो, लेकिन इन बुजुर्गों के बयानों ने एक बार फिर चित्तौड़गढ़ के रहस्यों को दुनिया के सामने लाकर खड़ा कर दिया है. 

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