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बाड़मेर में ऊंट की हड्डियों से बनाते हैं सजावटी सामान, वैश्‍व‍िक बाजार में बनाई खास जगह

आमतौर पर लोग जानवरों की हड्डियों को छूने से कतराते हैं, लेकिन ऊंट की हड्डियों से बने ये सजावटी सामान विदेशों में घरों की शोभा बढ़ा रहे हैं.

बाड़मेर में ऊंट की हड्डियों से बनाते हैं सजावटी सामान, वैश्‍व‍िक बाजार में बनाई खास जगह
ऊंट की हड्डियों के बने टेबल और कुर्सी.

भारतीय हस्तशिल्प की दुनिया में ऊंट की हड्डियों से बने सजावटी और उपयोगी आइटम्स ने हाल के वर्षों में वैश्विक बाजार में अपनी खास जगह बनाई है. ये अनूठे उत्पाद, जो परंपरा और कला का संगम हैं, विदेशी बाजारों में तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं. पारंपरिक शिल्पकारों की मेहनत और रचनात्मकता से तैयार ये आइटम्स न केवल सौंदर्यपूर्ण हैं, बल्कि पर्यावरण के अनुकूल भी हैं, जिसके कारण इनकी मांग में लगातार इजाफा हो रहा है.

झांगाराम 30 साल से बना रहे सजावटी सामान 

पश्चिमी राजस्थान के बाड़मेर जिले के चौहटन कस्बे में एक अनोखा हस्तशिल्प फल-फूल रहा है, जहां ऊंट की हड्डियों को कुशल कारीगरी के जरिए खूबसूरत सजावटी सामानों में बदला जा रहा है. इस अनूठे कारोबार के केंद्र में हैं झांगाराम, जो पिछले 30 सालों से ऊंट की हड्डियों से सजावटी सामान बनाने का काम कर रहे हैं. उनके नेतृत्व में चौहटन में स्थापित एक फैक्ट्री में कुर्सियां, टेबल, स्टूल, सोफा सेट, गिफ्ट आइटम, ट्रे, डिब्बियां और अन्य सजावटी उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं, जो जोधपुर के रास्ते देश-विदेश में निर्यात हो रहे हैं.

यूपी से जोधपुर पहुंचती हैं हड्डियां 

झांगाराम बताते हैं कि यह पूरा प्रोसेस व्यवस्थित और साफ-सुथरा है. उत्तर प्रदेश से साफ की गई ऊंट की हड्डियां पहले जोधपुर पहुंचती हैं, जहां से इन्हें बाड़मेर लाया जाता है. उनकी फैक्ट्री में आधुनिक मशीनों और कुशल कारीगरी के जरिए इन हड्डियों को छोटे-छोटे टुकड़ों में तराशा जाता है और फिर इन्हें आकर्षक डिजाइनों में ढाला जाता है. यह प्रक्रिया न केवल तकनीकी रूप से जटिल है, बल्कि इसमें कारीगरों की रचनात्मकता और बारीक कला का भी समावेश होता है.

ऊंट की हड्डियों के बने सजावटी सामान.

ऊंट की हड्डियों के बने सजावटी सामान.

10 साल से फैक्ट्री चला रहे झांगाराम 

झांगाराम ने इस कला को जोधपुर में शुरू किया था, लेकिन पिछले 10 सालों से उन्होंने चौहटन में अपनी फैक्ट्री स्थापित की है, जहां 10 कुशल कारीगरों की टीम उनके साथ काम करती है. यह फैक्ट्री न केवल स्थानीय कारीगरों को रोजगार दे रही है, बल्कि बाड़मेर के इस अनोखे हस्तशिल्प को वैश्विक मंच पर पहचान भी दिला रही है. झांगाराम के मुताबिक, कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान कारोबार में कुछ कमी आई थी, लेकिन अब मांग फिर से बढ़ रही है, जिससे कारीगरों को अच्छा रोजगार मिल रहा है.

विदेशी बाजारों में तेजी से मांग बढ़ी 

इन उत्पादों की मांग खासकर विदेशी बाजारों में तेजी से बढ़ रही है, जहां इन्हें उनकी अनूठी बनावट और पर्यावरण-अनुकूल प्रकृति के लिए सराहा जा रहा है. ये सामान न केवल सौंदर्यपूर्ण हैं, बल्कि टिकाऊ और हल्के भी हैं, जो इन्हें वैश्विक बाजार में और आकर्षक बनाता है.

शिल्प कौशल का प्रतीक बनकर उभर रहा

इस हस्तशिल्प ने न केवल बाड़मेर के कारीगरों को आर्थिक रूप से सशक्त किया है, बल्कि स्थानीय स्तर पर एक ऐसी कला को जीवित रखा है, जो परंपरा और आधुनिकता का अनोखा संगम है. झांगाराम और उनकी टीम का यह प्रयास दर्शाता है कि कैसे स्थानीय संसाधनों और कारीगरी से वैश्विक स्तर पर पहचान बनाई जा सकती है. बाड़मेर का यह हस्तशिल्प अब न केवल भारत की सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा है, बल्कि विदेशों में भारतीय कला और शिल्प कौशल का प्रतीक बनकर उभर रहा है.

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