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This Article is From Jan 20, 2026

Khatushyamji: बसंत पंचमी पर खाटूश्याम जाने की है तैयारी? जान लें मंदिर कमेटी का यह नया फैसला; नहीं होगा ये खास काम

Khatushyamji: बसंत पंचमी को लेकर सीकर की खाटूश्यामजी मंदिर कमेटी ने श्याम भक्तों के लिए एक अपडेट दिया है, जिसमें बाबा श्याम से जुड़ी जानकारी शेयर की गई है. इसके साथ ही मंदिर में सरस्वती पूजन के दिन दर्शन के लिए आने वाले भक्तों को अफवाहों से दूर रहने को कहा गया है.

Khatushyamji: बसंत पंचमी पर खाटूश्याम जाने की है तैयारी? जान लें मंदिर कमेटी का यह नया फैसला; नहीं होगा ये खास काम
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Rajasthan News: सीकर के प्रसिद्ध खाटूश्यामजी मंदिर ने बसंत पंचमी को लेकर श्रद्धालुओं के लिए एक महत्वपूर्ण सूचना जारी की है. माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाए जाने वाले इस पर्व की तैयारियां मंदिर में बड़े स्तर पर चल रही हैं. इस बीच, विद्या और संगीत की देवी मां सरस्वती को समर्पित इस विशेष दिन को लेकर सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों पर कई तरह की अफवाहें फैल रही थीं. इन भ्रामक खबरों पर विराम लगाते हुए मंदिर कमेटी ने आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी किया है और सभी अफवाहों को पूरी तरह गलत बताया है.

बसंत पंचमी पर खाटू श्याम मंदिर में नहीं बटेंगे पीला वस्त्र

श्री श्याम मंदिर कमेटी ने बताया कि बसंत पंचमी पर बाबा का वस्त्र बाघा बदलने की परंपरा है. जिसके बाद उसकी कतरनों को श्याम भक्तों में वितरित किया जाता है. जिसे लेकर जानकारी दी गई है कि बसंत पंचमी के दिन खाटू श्याम में पीला वस्त्र बांटने की  कोई परंपरा नहीं है. और ना ही बसंत पंचमी यानी 23 जनवरी को लेकर  पीला वस्त्र वितरण का कोई कार्यक्रम रखा गया है. इसलिए सोशल मीडिया के माध्यम से फैल रही अफवाहों और भ्रामक पोस्ट से बचे.

मंदिर कमेटी की तरफ से जारी सूचना

मंदिर कमेटी की तरफ से जारी सूचना

मंदिर कमेटी की तरफ से जारी सूचना
Photo Credit: NDTV

 अंत वस्त्र को कहा जाता है बाघा

बता दें कि साल में सिर्फ एक बार बसंत पंचमी के दिन बाबा श्याम का अंत वस्त्र बदला जाता है. जिसे ‘बाघा' कहा जाता है. यह केसरिया रंग का होता है और इसे बाबा के गले से लिपटाया जाता है. इस दिन बाबा को पीले रंग में सजाना उनके प्रति श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक है.  प्रति वर्ष बंसत पंचमी के मौके पर यह बदला जाता है. बताया गया है कि खाटू श्याम के गले में साल भर लिपटा रहने वाला यह केसरिया वस्त्र बाघा को गले से उतारने के बाद इसमें से प्रतीकात्मक रुप से श्रद्धालुओं को पूजन आदि के लिए (कतरने के रूप में ) वितरित भी किया जाता है. लेकिन यह कब किया जाता है इसे मंदिर कमेटी ही तय करती है. 

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