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Rajasthan: जानिए सबसे अलग कैसे हैं मोकलसर की 'मस्से वाली' मटकियां? भीषण गर्मी में भी पानी रहता है ठंडा

गर्मी की सीजन में यहां की मटकियां की गुजरात सहित प्रदेश के कई हिस्सों बिक्री होती है, यहां के मटकों की कीमत 150 से 200 रुपये तक होती है और रोजाना यहां से ट्रक से मटकी लादकर पड़ोसी राज्यों में सप्लाई होती है. अब यहां परम्परागत मटकी के साथ डिजाइनदार मटकी भी बनने लगी है. जो दिखने मे भी सुंदर दिखाई देती है.

Rajasthan: जानिए सबसे अलग कैसे हैं मोकलसर की 'मस्से वाली' मटकियां?  भीषण गर्मी में भी पानी रहता है ठंडा
पानी को ठंडा रखती हैं मोकलसर की मटकियां

Mokalsar News: भीषण गर्मी के दौर में हलक को तर करने वाले पानी की बूंदे अमृत समान होती है, वहीं पानी मिट्टी के मटके का हो और उसमें मिट्टी की सोंधी महक हो वो तो गले और तन को सकून दिलाती है. ऐसी ही मटकी की कहानी है बालोतरा जिले के मोकलसर की यहां के मिट्टी के मटके की अलग ही पहचान है. मोकलसर में आज भी गर्मियों के लिए मटके का निर्माण जोर शोर से जारी है. यहां के मटके गुजरात के साथ अन्य राज्यों तक प्रसिद्ध है.

बालोतरा के सिवाना उपखण्ड स्थित मोकलसर जहां करीब 50 से अधिक कुम्भकार परिवार इस मटकी निर्माण कार्य से जुड़े है. यहां मटके बनाने में काम आने वाली मिट्टी जालोर जिले रायथल, भंवरानी आदि गांवों के तालाबो से लाई जाती है. यहां की मस्से वाली मटकी की खासियत है कि कितनी गर्मी हो पानी हमेशा ठंडा रहता है. इसका कारण है इसके बनाने की विधि.

बेहद ख़ास हैं 'मस्से वाली मटकियां' 

दरअसल मटके बनाने की मिट्टी में यहां बरसाती नालों की बजरी भी मिलाई जाती है,मटकी की दानेदार सतह को जब भट्टी में तपाया जाता है तो मिट्टी के साथ बजरी भी पक जाती है मटकी में मस्से की शक्ल लेती है. जब मटकी में पानी भरते हैं तो मस्सों से पानी हल्के हल्के रिसता रहता है जिससे मटके की बाहरी परत हमेशा गीली रहती है और हवा के सम्पर्क में आने पर मटका ठंडा रहता है. जिससे उसमे भरा पानी भी ठंडा रहता है. इसी मस्से की खासियत के कारण मोकलसर के मटकों की मांग भी बहुतायत मात्रा में होती है.

देश -प्रदेश में कई जगह है मटकियों की डिमांड  

गर्मी की सीजन में यहां की मटकियां की गुजरात सहित प्रदेश के कई हिस्सों बिक्री होती है, यहां के मटकों की कीमत 150 से 200 रुपये तक होती है और रोजाना यहां से ट्रक से मटकी लादकर पड़ोसी राज्यों में सप्लाई होती है. अब यहां परम्परागत मटकी के साथ डिजाइनदार मटकी भी बनने लगी है. जो दिखने मे भी सुंदर दिखाई देती है. लेकिन अब आसानी से मिट्टी नहीं मिलने और मटकी पकाने के लिए जलाऊ लकड़ी महंगी मिलने पर कुंभकारों का धीरे-धीरे मटकी उद्योग से मोहभंग हो रहा है.

कम हो रहा मटकियां बनाने का रुझान 

इस पर अब कुछ परिवार ही मटकियां बनाने रूचि दिखा रहे हैं. मटकी बनाने वाले कुंभकारों के अनुसार यह हस्तशिल्प कला का ही एक नमूना है. आधुनिक चकाचौंध के बीच मटकियों की मांग वैसे भी कम हो रही है. ऐसे में सरकार इसको संरक्षण दें और मिट्टी की उपलब्धता के साथ आर्थिक सहयोग दें तो कई परिवारों का पालन-पोषण हो सकता है.

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