सांचौर के सुदूर ग्रामीण अंचल में स्थित होथीगांव का फूल मुक्तेश्वर शिव मंदिर आस्था और विश्वास का जीवंत केंद्र बन चुका है. रविवार (15 फरवरी) को महाशिवरात्रि पर यहां श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ता दिख रहा है. स्थानीय लोगों का दावा है कि इस मंदिर का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है और इससे जुड़ी दंतकथाएं आज भी जनमानस में गूंजती हैं. स्थानीय मान्यता के अनुसार, इस क्षेत्र को प्राचीन काल में “हसनापुर” नाम से जाना जाता था. लोककथाओं में वर्णन है कि यहां घी और दूध की नदियां बहती थीं. शिवलिंग के आसपास चमत्कारिक रूप से दूध और घी प्रकट होकर बहते थे. यह कथा आज भी श्रद्धालुओं के बीच गहरी आस्था का विषय है.
जंगल से धाम बनने तक की कथा
ग्रामीणों के अनुसार, जहां आज मंदिर स्थापित है, वहां प्राचीन काल में घना जंगल हुआ करता था. चरवाहे अपनी गायों को चराने यहां लाते थे. लोककथाओं में वर्णन मिलता है कि एक विशेष स्थान पर पत्थर पर नाग देवता की आकृति उकेरी हुई थी. चरवाहों ने देखा कि एक गाय प्रतिदिन उसी पत्थर के पास जाकर खड़ी हो जाती और गाय का दूध उस पत्थर पर गिरने लगता.
जब यह बात गांव में फैली तो ग्रामीणों ने खुद यह दृश्य देखा. इसे दैवीय चमत्कार मानकर उस स्थल को भगवान शिव का स्वरूप माना गया और पूजा-अर्चना प्रारंभ हुई. धीरे-धीरे यहां शिवलिंग के स्वयंभू (स्वतः प्रकट) होने की मान्यता जुड़ गई और स्थान की ख्याति बढ़ती चली गई.

'फूल मुक्तेश्वर' नाम की उत्पत्ति
मंदिर के नाम को लेकर भी विशेष मान्यता है. कहा जाता है कि प्राचीन काल में राजा फुल नामक किसी स्थानीय शासक ने यहां मंदिर के विकास और पूजा-अर्चना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. उनके नाम से ही मंदिर 'फूल मुक्तेश्वर' कहा जाने लगा. कुछ लोग इसे पूर्ण मुक्ति के प्रतीक से भी जोड़ते हैं यानी वह शिव, जो पूर्ण मोक्ष प्रदान करते हैं. लोकपरंपरा में दोनों मान्यताएं प्रचलित हैं.
मान्यता- पूजा-अर्चना से मनोकामना होती है पूरी
मंदिर से जुड़ी सबसे प्रबल मान्यता यह है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई हर मन्नत पूरी होती है. संतान प्राप्ति, रोग मुक्ति, आर्थिक संकट से राहत, पारिवारिक सुख-शांति. श्रद्धालु जलाभिषेक, दुग्धाभिषेक और विशेष पूजा-अर्चना कर अपनी कामनाएं व्यक्त करते हैं. स्थानीय लोगों के अनुसार, अनेक भक्त अपनी मनोकामना पूर्ण होने के बाद यहां पुनः आकर धन्यवाद अर्पित करते हैं.
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