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क्या पंजाब रोक सकता है राजस्थान का पानी, कितना मजबूत है भगवंत मान का रॉयल्टी वाला दावा?

शिमला में 4 सितंबर 1920 को ब्रिटिश प्रोविंस के पंजाब, बीकानेर रियासत और बहावलपुर रियासत के बीच हुआ था. पंजाब के सीएम भगवंत मान साल इसी समझौते का हवाला देते हुए रॉयल्टी मांग रहे हैं.

क्या पंजाब रोक सकता है राजस्थान का पानी, कितना मजबूत है भगवंत मान का रॉयल्टी वाला दावा?

पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने राजस्थान से पानी के लिए 1.44 लाख करोड़ रुपए की रॉयल्टी की मांग की है. उनके इस बयान के बाद से ही एक नए विवाद पर बहस छिड़ गई है. भगवंत मान इस मुद्दे को अब कोर्ट में ले जाने की बात कह रहे हैं. वही, राजस्थान सरकार ने इस मुद्दे को केवल एक राजनीतिक बयान बाजी करार देते हुए बेतुका बता दिया है. भगवंत मान 1920 के समझौते का हवाला देते हुए यह रॉयल्टी मांग रहे हैं. 4 सितंबर 1920 को शिमला में ब्रिटिश प्रोविंस के पंजाब, बीकानेर रियासत और बहावलपुर रियासत के बीच हुआ था. इस समझौते को सतलज घाटी परियोजना भी कहा जाता है. 

साल 1981 में 3 राज्यों में हुआ था समझौता

साल 1981 में पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के बीच तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के समर्थन से त्रिपक्षीय समझौता हुआ. उस वक्त तीनों ही राज्यों में कांग्रेस की सरकार थी. समझौते के तहत रावी-ब्यास जल को 17.17 मिलियन एकड़ फुट (MAF) के आधार पर बांटा गया. इसी समझौते से राजस्थान की इंदिरा गांधी नहर प्रणाली का विस्तार हुआ. इस नहर प्रणाली से पंजाब के हरिके बैराज से थार तक पानी पहुंचता है. वहीं, भगवंत मान के अचानक दिए गए इस फरमान को राजनीतिक बयान बाजी से जोड़ा जा रहा है.

राजस्थान के जल संसाधन मंत्री सुरेश सिंह रावत ने कहा कि वे केवल राजनीति के लिए ऐसा कर रहे हैं, पंजाब में चुनाव है. चुनाव को लेकर यह बयानबाजी की जा रही है. राजस्थान कांग्रेस के मुख्य सचेतक रफीक खान ने भी पंजाब के मुख्यमंत्री के बयान को बेतुका और बेवजह का शिगुफा छेड़ने वाला बताया. उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ही इस मुद्दे का समाधान कर सकती है.

पंजाब में भूजल को दोहन 150 फीसदी के पार, बढ़ी परेशानी

हालांकि, राजनीतिक बयान बाजी के इधर भी इस बयान के कुछ मायने हैं. पंजाब में भूजल निरंतर कम हो रहा है. ऐसे में पंजाब के सामने भी पानी की समस्या सामने आ रही है. सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड की 2024- 25 की रिपोर्ट के मुताबिक पंजाब में भूजल का दोहन 156.36 प्रतिशत है. जबकि देश में यह औसतन 60.63 प्रतिशत है. इसी वजह से पंजाब के करीब 19 जिलों में भूजल स्तर काफी नीचे जा चुका है.

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि देश में नदियों के तंत्र खासकर सिंधु नदी के आसपास विकास पर ध्यान बढ़ा है. ऐसे में 1.44 लाख करोड रुपए की रॉयल्टी मांग कर पंजाब आगे किसी भी नेगोशिएशन के लिए खुद को मजबूत करना चाह रहा है.

क्या पहले कभी ऐसा हुआ है?

साल 2004: पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने पंजाब टर्मिनेशन ऑफ एग्रीमेंट्स एक्ट 2004 पारित किया था. इसके तहत उन्होंने हरियाणा, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश के साथ हुए सभी पुराने समझौते को रद्द करने का प्रयास किया था. हालांकि इस एक्ट के बावजूद राजस्थान को मिलने वाला पानी नहीं रुका.

साल 2016: सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अहम फैसला दिया. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोई भी राज्य अंतर राज्य समझौते को एक तरफ रद्द नहीं कर सकता. इसके साथ ही एक बार फिर पुराना सिस्टम लागू हो गया.

इस एक्ट को बाद में रद्द कर दिया गया था, लेकिन राजनीतिक रूप से इस कदम ने कैप्टन अमरिंदर सिंह को फायदा दिया. पंजाब में राजनीतिक रूप से अमरिंदर सिंह को "पंजाब दे पानी दा राखा" के रूप में बुलाया जाने लगा.

क्या कहता है संवैधानिक पक्ष?

  • राजनीतिक और ऐतिहासिक पक्ष के अलावा इस मामले को संविधान और कानूनी रूप से समझाना भी जरूरी है. 1920 के जिस समझौते का हवाला दिया जा रहा है, वह ब्रिटिश काल में हुआ. साल 1950 में भारत में नया संविधान लागू हुआ. संविधान में केंद्र और राज्यों के विषयों के लिए पृथक सूचियां बनाई गई हैं. 
  • राज्य की सूची में 17वें बिंदु पर पानी, सिंचाई, नहर परियोजनाओं आदि से जुड़ा विषय आता है. हालांकि इसके साथ में एक बात लिखी गई कि यह केंद्रीय सूची के 56वें विषय से जुड़ा हुआ रहेगा. अंतरराज्य नदियों घाटी परियोजनाओं आदि के बारे में केंद्र सरकार को ही अधिकार दिए गए हैं
  • संविधान का अनुच्छेद 262 संसद को यह अधिकार देता है कि पानी से जुड़े अंतरराज्यीय विवाद के लिए नियम बना सके. इसी के तहत इंटर 'स्टेट रिवर वॉटर डिस्प्यूट्स एक्ट-1956' बनाया गया, जिसके तहत ऐसे किसी भी विवाद को हल करने के लिए ट्रिब्यूनल बनाया जाएगा. अगर भगवंत मान को राहत चाहिए भी तो उन्हें केंद्र सरकार के पास जाना होगा.
  • कानूनी जानकार मानते हैं कि ब्रिटिश काल में ब्रिटिश शासन के साथ हुए समझौते की वैधता भारत के संप्रभु बनते ही खत्म हो जाती है. भारतीय संविधान के मुताबिक, यह विषय केंद्र का है. पानी को व्यापारिक वास्तु के रूप में नहीं माना जाता है. भारत की 'राष्ट्रीय जल नीति-2012' के मुताबिक भी सभी क्षेत्रों में सतत न्याय संगत और कुशल जल उपयोग को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को निर्धारित करना बताया गया है.

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