Rajasthan News: प्रदेश में फर्जी प्रमाण पत्र के जरिए नौकरी लगने के मामले में कार्रवाई जारी है. अब तक फर्जी प्रमाण पत्र मामले में सैकड़ों कर्मचारियों को पकड़ा गया है. लेकिन मामले में कोर्ट के सामने सबूत पेश करने में पुलिस कितनी सक्षम है, इसका पता नहीं. लेकिन आरोप लगने से कर्मचारियों की जिंदगी तबाह हो जाती है. ऐसा ही मामला राजस्थान में आया है, जहां एक सरकारी कर्मचारी को 16 साल बाद न्याय मिला है. उस पर फर्जी जाति प्रमाण पत्र के जरिए नौकरी हासिल करने का आरोप लगा है. लेकिन 16 साल बाद जयपुर के CJM कोर्ट ने 16 साल बाद कर्मचारी को दोषमुक्त कर दिया है.
साल 2009 से यह मामला लंबित है, लेकिन 16 साल में भी पुलिस कोई गवाह या साक्ष्य पेश नहीं कर पाई. जिसके बाद कोर्ट ने मामले को खत्म कर दिया है
क्या है पूरा मामला
दरअसल, जयपुर के रहने वाले नाथूलाल ने 8 दिसम्बर 2001 को त्रिवेंद्रम में एसआईबी में अनुसूचित जनजाति वर्ग की वैकेंसी में चतुर्थ श्रेणी के पद पर नौकरी हासिल की. इसके बाद दिल्ली हाईकोर्ट के निर्देश पर 1 जनवरी 1995 के बाद एसटी वर्ग में नौकरी लगे सभी कार्मिकों के दस्तावेज जांच किए जाने लगे. इसके लिए नाथूलाल के जाति प्रमाण पत्र के लिए जयपुर तहसीलदार को लिखा गया. तहसीलदार ने जवाब में बताया कि नाथूलाल धोबी जाति से है. इसलिए वे एससी यानी अनुसूचित जाति में आते हैं, ना कि एसटी यानी अनुसूचित जनजाति में आते हैं. नाथूलाल ने जाति प्रमाण पत्र में "जन" शब्द जोड़ा है. 1 अप्रैल 2009 को इसके लिए रिपोर्ट पेश की गई.
करीब 16 साल बाद भी पुलिस की ओर से कोई गवाह या साक्ष्य नहीं पेश किया गया. मामले में नाथूलाल की ओर से अधिकवक्ता भंवर बागड़ी और हितेश बागड़ी ने पैरवी की.
40 साल पहले तहसील ने की थी गड़बड़ी
एडवोकेट हितेश बागड़ी ने बताया कि कि नाथू लाल धोबी के मामले में 16 साल में एक भी गवाही नहीं हुई. पूरा वाकिया 40 साल पहले शुरू होता है. तहसील जयपुर ने धोबी, एससी जाति के व्यक्ति को एसटी का कास्ट सर्टिफिकेट 03 दिसंबर 1985 दे दिया. वहीं, तहसील डिस्पेच एन्ट्रीज के रजिस्टर के अनुसार इसके अलावा घनश्याम बैरवा और अन्य लोग जो एससी में आते थे. उन्हें भी एसटी का सर्टिफिकेट दिया गया.
मामले में अब तक कोई गवाही या साक्ष्य नहीं आए. ऐसे में अनिश्चित काल तक सबूत ना आए तो माननीय न्यायालय आरोप तय होने के बावजूद त्वरित न्याय के हितार्थ केस का फैसला कर सकता है, एवं साक्ष्य के अभाव मे मुल्जिम को बरी कर सकता है.
पीठासीन अधिकारी एसीजेएम-6 श्री कन्हैयालाल पारीक ने सभी दलील सुनने के बाद मुलजिम नाथूलाल को बरी करते हुए कहा कि अभियुक्त के खिलाफ आरोपित अपराध के संबंध मे कोई मौखिक एवं दस्तावेजी साक्ष्य पत्रावली पर न होने से अभियोजन की कहानी की पुष्टि नहीं होती है. इसलिए आरोपित कर्मचारी को दोषमुक्त करने का आदेश पारित किया जाता है.
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