Rajasthan News: राजस्थान में तबादले (Transfer) की सियासत कोई नई बात नहीं है, लेकिन इस बार मामला कुछ अलग है. अमूमन फाइलों में दब जाने वाले तबादले के आदेश अब राजस्थान हाई कोर्ट (Rajasthan High Court) की मेज पर हैं और जस्टिस समीर जैन की तल्ख टिप्पणियों ने सरकार की नींद उड़ा दी है. कोर्ट ने राज्य के सबसे बड़े ब्यूरोक्रेट यानी मुख्य सचिव (CS) और प्रमुख शिक्षा सचिव को जिस तरह 23 जनवरी को दोपहर 2 बजे तलब किया है, उसने प्रशासन के भीतर एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है.
टाइमिंग का फेर, जिसने विवाद को जन्म दिया
इस पूरे विवाद की जड़ किसी एक ट्रांसफर में नहीं, बल्कि उन तबादलों की 'टाइमिंग' में छिपी है. दरअसल, शिक्षा विभाग ने बीते दिसंबर और इसी जनवरी (2025-26) के महीनों में ताबड़तोड़ तबादला सूचियां जारी कीं. राजस्थान शिक्षा विभाग का अपना कैलेंडर (Shivira Calendar) कहता है कि शिक्षकों के तबादले मुख्य रूप से गर्मियों की छुट्टियों में होने चाहिए, लेकिन जब छात्र बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी के लिए आखिरी बार अपना सिलेबस दोहरा रहे थे, ठीक उसी वक्त उनके शिक्षकों के पास रवानगी के आदेश पहुंच गए. इसी विरोधाभास ने शिक्षकों को कोर्ट की दहलीज तक पहुंचा दिया. ध्यान दिला दें कि बीते कुछ पहले तक जो बच्चों के प्रदर्शन करने की खबरें आ रही थीं, वो इन्हीं तबादलों के विरोध में थीं.
जब कोर्ट ने पूछा- इतनी भी क्या जल्दी थी?
बुधवार को मैना गढ़वाल और महेंद्र कुमार की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने इसी 'जल्दबाजी' पर सवाल उठाए हैं. याचिकाकर्ताओं की ओर से एडवोकेट संदीप कलवानिया ने कोर्ट में दलील दी कि बीच सत्र में शिक्षक के बदलने से न केवल छात्र मानसिक रूप से परेशान होते हैं, बल्कि उनका साल भी खराब होने का डर रहता है. कोर्ट ने दलीलों को वाजिब माना और अब अधिकारियों को खुद आकर यह बताना होगा कि आखिर किन 'प्रशासनिक अनिवार्यताओं' के चलते छात्रों के भविष्य को दांव पर लगाया गया.
अब सबकी निगाहें 23 जनवरी की दोपहर 2 बजे होने वाली उस सुनवाई पर टिकी हैं, जहां सरकार के दो सबसे बड़े अधिकारी कोर्ट के सामने व्यक्तिगत या वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए उपस्थित होंगे..
ये भी पढ़ें:- "परीक्षा में हिजाब अलाउड नहीं", विवाद के बाद आलोक राज का आया बयान; NDTV पर बताई वजह