जब भी इतिहास या सभ्यताओं की बात होती है तो पहचान केवल उनके शासकों से नहीं होती. बल्कि उन शिल्पियों और आर्किटेक्ट्स से भी होती है, जिन्होंने नगर बसाए, दुर्ग गढ़े और मंदिरों को आकार दिया. वो लोग, जिन्होंने संस्कृति को पत्थरों पर अमर कर दिया. लेकिन जिन क्रिएटिव माइंड्स ने दुनिया को पहचान दी, उन्हें सार्वजनिक स्मारकों में शायद ही कभी स्थान मिला. अब झीलों की नगरी उदयपुर इस ऐतिहासिक कमी को दूर करने की दिशा में एक अनूठी पहल कर रही है. यहां नींव रखी जा रही है ऐसे टावर की, जहां आर्ट को सहेजा जा सकेगा.
कुंभलगढ़ दुर्ग के 'आर्टिकेक्ट' से ली प्रेरणा
शहर के शोभागपुरा स्थित जेके सर्किल पर लगभग 35 फीट ऊंचा 'आर्किटेक्ट्स टावर' बनने वाला है. उदयपुर विकास प्राधिकरण (UDA) के इस चौराहे पर जेके आर्थोपेडिक हॉस्पिटल से निर्माण कराया जा रहा है. प्रियंका कोठारी जैसे कई युवा आर्किटेक्ट इसे आकार दे रहे हैं.
प्रोजेक्ट डायरेक्टर आर्किटेक्ट सुनील लड्ढा ने बताया कि 15वीं शताब्दी में महाराणा कुंभा के प्रधान आर्किटेक्ट मंडन से प्रेरणा ली. आचार्य मंडन के ही मार्गदर्शन में विश्वप्रसिद्ध कुंभलगढ़ दुर्ग का निर्माण हुआ. इसके अलावा चित्तौड़गढ़ दुर्ग के अनेक महलों, मंदिरों और अन्य आर्किटेक्चरल कार्यों में भी उनके योगदान रहा. उन्होंने कई ग्रन्थ भी लिखे जो आज भी भारत और विदेशों में आर्किटेक्चर स्टडी का महत्वपूर्ण संदर्भ माने जाते हैं.

उदयपुर के आर्किटेक्ट टावर के निर्माण कार्य में जुटे हैं.
टाइम कैप्सूल बताएगा- इतिहास का उदयपुर कैसा था
इसमें दो खास बात होगी. पहला तो इसमें एक टाइम कैप्सूल डाला जाएगा, जिसकी टाइमिंग 50 साल सेट की जाएगी. इसमें उदयपुरवासी अपनी क्रिएटिविटी या कोई अनोखा कार्य किया, वह रख पाएंगे. इन आर्किटेक्ट का कहना है, "50 साल बाद दुनिया में क्या हो कोई नहीं जान सकता. जब इस कैप्सूल को 50 साल बाद खोला जाएगा, तब देख पाएंगे कि इतिहास का उदयपुर कैसा था."
शोभागपुरा चौराहे पर बनाया जाएगा टावर
दूसरी खास बात यह है कि मंडन ने ही चित्तौड़गढ़ किले पर स्थित विजय स्तंभ को डिजाइन किया है. इस तर्ज पर शोभागपुरा चौराहे पर टावर बनाया जाएगा. यह दो साइड से ही दिखेगा. यहां जंतर-मंतर से प्रेरणा लेकर दो घड़ियां लगाई जाएंगी. एक निर्मल घड़ी होगी तो दूसरी सूर्य चलित घड़ी.
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