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आज भी चीख रहे नीमूचाणा में गोलियों के निशान, 250 से ज्यादा किसानों की हुई थी शहादत; गांधीजी ने कहा था 'दूसरा जलियांवाला बाग'

राजस्थान की अलवर रियासत के नीमूचाणा में दोहरे लगान व शोषण के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे 250 से अधिक किसानों पर अंधाधुंध फायरिंग की गई थी. जहां आज भी हवेलियों पर गोलियों के निशान बने हुए हैं.

आज भी चीख रहे नीमूचाणा में गोलियों के निशान, 250 से ज्यादा किसानों की हुई थी शहादत; गांधीजी ने कहा था 'दूसरा जलियांवाला बाग'
राजस्थान की अलवर रियासत के नीमूचाणा में किसानों पर गोलियां चली थी.

Rajasthan News: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में पंजाब के जलियांवाला बाग की क्रूरता से तो हर कोई वाकिफ है, लेकिन राजस्थान की धरती पर भी एक ऐसा ही खौफनाक मंजर देखा गया था. अलवर रियासत के नीमूचाणा गांव में आज से ठीक 101 साल पहले यानी 14 मई 1925 को हुआ नरसंहार राजस्थान के इतिहास का सबसे काला अध्याय है.

इस नृशंस कांड की 101वीं बरसी पर आज भी पूरा इलाका उन 250 से ज्यादा शहीद किसानों को याद कर भावुक है जिन्होंने दोहरे लगान और दमनकारी नीतियों के खिलाफ अपनी जान न्यौछावर कर दी थी.

दोहरे लगान और शोषण के खिलाफ गूंजी थी आवाज

तत्कालीन समय में अलवर रियासत के किसान भारी टैक्स, बेगार प्रथा और जंगली सूअरों द्वारा फसलों की बर्बादी से बेहद त्रस्त थे. इसी शोषण के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करने के लिए किसान नीमूचाणा गांव में शांतिपूर्वक तरीके से इकट्ठा हुए थे. किसानों की इस एकजुटता से बौखलाई रियासत की फौज ने पूरे गांव को चारों तरफ से घेर लिया और निहत्थे ग्रामीणों पर अंधाधुंध गोलियां बरसा दीं.

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इस फायरिंग में 250 से अधिक किसान मौके पर ही शहीद हो गए और 100 से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल हुए. क्रूरता यहीं नहीं रुकी, फौज ने गांव के करीब 150 घरों को आग के हवाले कर दिया जिससे भारी संख्या में मवेशी भी जिंदा जल गए.

महात्मा गांधी ने कहा था 'दूसरा जलियांवाला बाग'

इस भयानक नरसंहार की गूंज तत्कालीन समय में पूरे देश में सुनाई दी थी. अजमेर के 'तरुण राजस्थान' और कानपुर के 'प्रताप' अखबार ने इस खबर को प्रमुखता से छापा. महान स्वतंत्रता सेनानी गणेश शंकर विद्यार्थी खुद पैदल चलकर पीड़ितों का दर्द बांटने नीमूचाणा पहुंचे थे.

वहीं राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने इस घटना की विभीषिका को देखते हुए इसे 'दूसरा जलियांवाला बाग' करार दिया था. सरदार वल्लभभाई पटेल ने भी बंबई की एक जनसभा में इस दमनकारी नीति की तीखी आलोचना की थी. इस देशव्यापी आक्रोश के आगे झुकते हुए आखिरकार अलवर रियासत को दोहरा लगान और बेगार प्रथा को वापस लेना पड़ा था.

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आज भी मौजूद हैं गोलियों के निशान

नीमूचाणा गांव की पुरानी हवेलियों और दीवारों पर आज भी गोलियों के निशान उस खौफनाक दिन की गवाही देते हैं. दुखद बात यह है कि इस ऐतिहासिक बलिदान के 100 साल से अधिक बीत जाने के बाद भी इस जगह को राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा नहीं मिल सका है. स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि हर बार उन्हें केवल आश्वासन मिलते हैं लेकिन धरातल पर कोई ठोस काम नहीं हुआ.

अब ग्रामीण अपने स्तर पर ही हर साल कैंडल मार्च निकालकर शहीदों को श्रद्धांजलि देते हैं. वर्तमान में बानसूर से विधायक देवी सिंह शेखावत केंद्र और राज्य की सत्ताधारी पार्टी से हैं, ऐसे में ग्रामीणों को उम्मीद है कि अब इस ऐतिहासिक स्थल को वह गौरव और सम्मान जरूर मिलेगा जिसका यह हकदार है.

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