राजस्थान में सत्ता परिवर्तन को सवा दो साल से ज्यादा वक्त गुजर चुका है, लेकिन कई अहम बोर्ड और आयोग अब भी अध्यक्षों के बिना चल रहे हैं. इंतजार इतना लंबा हो गया है कि दीपावली के बाद होली भी सियासी नियुक्तियों के बिना ही गुजर गई. अब सवाल यही है कि आखिर ये देरी कब खत्म होगी? राजस्थान की सियासत में इन दिनों सबसे बड़ा भी सवाल यही है कि बोर्ड और आयोगों में नियुक्तियां कब होंगी? दो साल से अधिक समय बीत जान के बाद भी कई आयोग-बोर्ड बिना मुखिया के चल रहे हैं. इसका असर प्रशासनिक कामकाज से लेकर सियासी संतुलन तक दिखाई दे रहा है.
चुनाव से पहले जोखिम लेना आसान नहीं!
दरअसल, इस देरी की सबसे बड़ी वजह निकाय और पंचायत चुनावों का अनिश्चित होना माना जा रहा है. सत्ता और संगठन दोनों चाहते हैं कि नियुक्तियों के जरिए राजनीतिक संतुलन साधा जाए. जब तक चुनावी स्थिति साफ नहीं होती, तब तक बड़ा फैसला लेने से परहेज किया जा रहा है.
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर इस समय बड़े पैमाने पर नियुक्तियां की जाती हैं तो गुटबाजी खुलकर सामने आ सकती है. यही कारण है कि सरकार फिलहाल संतुलन बनाए रखने की रणनीति पर काम कर रही है. सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती संतुलन की है. एक तरफ संगठन के दावेदार हैं तो दूसरी तरफ सत्ता में हिस्सेदारी की उम्मीद लगाए नेता. ऐसे में बिना चुनावी तस्वीर साफ हुए नियुक्तियां करना सियासी जोखिम भी बन सकता है.
मंत्रिमंडल फेरबदल पर विराम!
प्रदेश में संगठन पर्व पूरा हो चुका है और पार्टी की प्रदेश कार्यकारिणी का गठन भी हो गया है. मंत्रिमंडल विस्तार की चर्चाएं भले ठंडी पड़ गई हों, लेकिन बोर्ड और आयोगों में नियुक्तियों को लेकर उम्मीद अब भी बनी हुई है. इन नियुक्तियों को सत्ता और संगठन के बीच संतुलन साधने का बड़ा जरिया माना जाता है. विधानसभा और लोकसभा चुनाव हार चुके नेताओं, टिकट से वंचित दिग्गजों और मंत्रिमंडल में जगह नहीं पाने वाले विधायकों को समायोजित करने के लिए इन्हें अहम माना जाता है.
इन आयोग में नियुक्तियों का इंतजार
महिला आयोग, बाल आयोग, ओबीसी आयोग, वक्फ बोर्ड, अल्पसंख्यक आयोग, समाज कल्याण सलाहकार बोर्ड, राज्य खेल परिषद जैसे कई अहम संस्थानों में पद खाली पड़े हैं. इसके अलावा, खादी बोर्ड, राजस्थान राज्य बीज निगम, आवासन मंडल, हज कमेटी, डांग विकास बोर्ड, मगरा विकास बोर्ड और जन अभाव अभियोग निराकरण समिति शामिल हैं. इन संस्थानों में अध्यक्ष नहीं होने से नीतिगत फैसलों और जनसुनवाई पर असर पड़ रहा है. कई मामलों में निर्णय लंबित हैं, जिससे आम लोगों को भी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है.
विपक्ष ने सरकार को घेरा
विपक्ष ने भी इस मुद्दे पर सरकार को घेरा है. कांग्रेस नेता रफीक खान का आरोप है कि सरकार के पास नियुक्तियों को लेकर कोई स्पष्ट नीति नहीं है और अनावश्यक देरी से प्रशासनिक काम प्रभावित हो रहे हैं. उनका यह भी कहना है कि अगर प्रक्रिया पारदर्शी होती, तो इतनी लंबी देरी नहीं होती.
"देरी की वजह विवाद नहीं, तय प्रक्रिया का हिस्सा"
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ ने बताया कि यह देरी किसी विवाद के कारण नहीं, बल्कि तय प्रक्रिया का हिस्सा है. मुख्यमंत्री स्तर पर अंतिम निर्णय से पहले संगठन और विभिन्न स्तरों पर चर्चा की जाती है, इसलिए समय लगना स्वाभाविक है.
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