लद्दाख के पर्यावरण कार्यकर्ता और इंजीनियर सोनम वांगचुक की हिरासत को चुनौती देने वाले मामले में सुप्रीम कोर्ट में सोमवार (16 फरवरी) को सुनवाई हुई. इस दौरान शीर्ष अदालत ने एक महत्वपूर्ण आदेश पारित करते हुए जोधपुर सेंट्रल जेल के अधीक्षक को निर्देश दिया कि वांगचुक के पास मौजूद पेनड्राइव को सीलबंद बॉक्स में लेकर कोर्ट में भेजा जाए. यह वही पेनड्राइव है, जिसमें उनके 23 भाषणों के वीडियो होने का दावा किया गया था और जो हिरासत के आधार के रूप में प्रस्तुत किए गए थे. याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि इनमें से चार अहम वीडियो उन्हें दिए ही नहीं गए. यह आदेश राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत वांगचुक की हिरासत की वैधता पर उठे सवालों के बीच आया है. जहां पेनड्राइव को सबूतों का प्रमुख हिस्सा माना जा रहा है.
हिंसक प्रदर्शन के बाद से हिरासत में सोनम वांगचुक
सोनम वांगचुक को 26 सितंबर 2025 को लद्दाख में राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची की मांग को लेकर हुए हिंसक प्रदर्शनों के बाद एनएसए के तहत हिरासत में लिया गया था. इन प्रदर्शनों में चार लोगों की मौत हो गई थी और 90 से अधिक घायल हुए थे. सरकार ने वांगचुक पर हिंसा भड़काने का आरोप लगाया, जिसमें उनके भाषणों को मुख्य आधार बनाया गया. हिरासत के बाद उन्हें जोधपुर सेंट्रल जेल में भेज दिया गया. 29 सितंबर 2025 को, हिरासत के आधार पर वांगचुक को एक पेनड्राइव दी गई, जिसमें कथित तौर पर उनके भाषणों की 23 वीडियो रिकॉर्डिंग्स शामिल थीं.
पेनड्राइव में 4 प्रमुख वीडियो गायब
सरकार का दावा था कि ये भाषण सार्वजनिक व्यवस्था और सीमा क्षेत्र की सुरक्षा के लिए खतरा थे. पेनड्राइव का उद्देश्य वांगचुक को हिरासत के आधारों से अवगत कराना था, ताकि वे अपना प्रतिनिधित्व कर सकें. हालांकि, वांगचुक की पत्नी डॉ. गीतांजलि अंगमो द्वारा दायर याचिका में दावा किया गया कि इस पेनड्राइव में चार प्रमुख वीडियो गायब थे, जो हिरासत आदेश में उद्धृत किए गए थे. इसके अलावा, भाषणों के ट्रांसक्रिप्ट्स को गलत बताया गया, जिसमें गैर-मौजूद सामग्री को शामिल किया गया था. वांगचुक ने सुप्रीम कोर्ट में यह भी स्पष्ट किया कि उनका इरादा सरकार को उखाड़ फेंकने का नहीं था, बल्कि लोकतांत्रिक तरीके से आलोचना और विरोध करने का था.
सरकार की ट्रांसक्रिप्टस की सटीकता पर संदेह
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पी.बी. वराले की बेंच ने सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार के ट्रांसक्रिप्ट्स की सटीकता पर संदेह जताया. वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने वांगचुक की ओर से तर्क दिया कि हिरासत आदेश गलत सामग्री पर आधारित था और वांगचुक को पूर्ण सबूत उपलब्ध नहीं कराए गए. कोर्ट ने यह सुनिश्चित करने के लिए पेनड्राइव मंगवाई कि क्या वास्तव में उन चार वीडियो को वांगचुक को प्रदान किया गया था या नहीं और भाषणों की सही अनुवाद/ट्रांसक्रिप्शन प्राप्त करने के लिए.
कोर्ट ने कहा, "हम सही अनुवाद की उम्मीद करते हैं." यह आदेश वांगचुक की हिरासत की वैधता को जांचने के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यदि सबूत अधूरे साबित हुए तो हिरासत रद्द हो सकती है. जोधपुर के संदर्भ में यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वांगचुक पिछले पांच महीनों से यहां की जेल में बंद हैं. उनकी सेहत बिगड़ने पर उन्हें जोधपुर के एम्स में शिफ्ट किया गया था, जहां मेडिकल जांच हुई. कोर्ट ने राजस्थान के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल को आदेश का अनुपालना सुनिश्चित करने का निर्देश दिया. जोधपुर जेल अधीक्षक को पेनड्राइव वांगचुक की मौजूदगी में सील करके कोर्ट भेजनी होगी, जो इस मामले को स्थानीय स्तर पर भी सुर्खियों में ला रहा है.
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