
Vasundhara Raje: जयपुर में भाजपा मुख्यालय में भाजपा के सभी 115 विधायक मौजूद हैं. सभी को भगवा राजस्थानी पगड़ी पहनाई गई है. सामने मंच है, मंच पर दिग्गज क्रमशः राजनाथ सिंह, सरोज पांडेय और विनोद तावड़े बैठे हैं. राजनाथ के बग़ल में राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे बैठी हैं. यही वो लम्हा है जब राजस्थान को नया मुख्यमंत्री मिलने वाला है, तभी राजनाथ सिंह वसुंधरा को एक पर्ची पकड़ाते हैं, वो उसे खोलती हैं, थोड़ा हिचकिचाती हैं और एक नाम बोलती हैं- भजन लाल शर्मा.
यही वो क्षण था जब राजस्थान में अशोक गहलोत और वसुंधरा राजे की आवर्ती ख़त्म होती है. 25 साल तक राजस्थान की सत्ता में रहे राजे- गहलोत का युग खत्म हो गया और नब्बे के दशक के आखिर में पैदा होने वाले राजस्थानियों ने पहली बार गहलोत-वसुंधरा के अलावा किसी और कोई मुख्यमंत्री देखा.
भाजपा ने ना सिर्फ हिंदी हार्ट लैंड को फिर कांग्रेस से छीन लिया है, बल्कि राज्यों का नेतृत्व भी बदल दिया. जानकार मानते हैं कि जब छत्तीसगढ़ से रमन सिंह और मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह को 'आराम' दिया गया, तभी वसुंधरा को अहसास हो गया था कि,वो मुख्यमंत्री नहीं बनने जा रही हैं.
लेकिन ऐसा अचानक नहीं हुआ, बल्कि इसकी शुरुआत 4 साल पहले ही हो गई थी. जब प्रदेशाध्यक्ष रहते मदन लाल सैनी का देहांत हो गया था. उस वक्त भाजपा की कमान किसको दी जाए इस पर पार्टी को काफी मशक्कत करनी पड़ी थी. कई दिन बाद भाजपा ने संघ के नज़दीकी सतीश पूनिया को अध्यक्ष बना दिया और यही वो पहला मौक़ा था जब राजस्थान भाजपा से वसुंधरा को किनारे करने की कवायद शुरू हो गई थी.
विधानसभा चुनावी अभियान के शुरूआती दिनों में राजे और राजस्थान भाजपा समानांतर चल रहे थे. भाजपा जब परिवर्तन यात्रा निकाल रही थी, उससे पहले वसुंधरा ने अपनी निजी यात्रा निकाली. मीडिया में यह खबर भी खूब चली कि क्या वो परिवर्तन यात्रा के उद्घाटन सभा में शामिल होंगी या नहीं? हालांकि वो उसमें शामिल हुई थीं. उसके बाद PM मोदी और भाजपा के अध्यक्ष नड्डा की सभाओं को छोड़ दें, तो वसुंधरा राज्य के शीर्ष नेताओं के साथ चुनावी सभाओं में नजर नहीं आईं. हालांकि उन्होंने खुद करीब 50 से अधिक चुनावी सभाओं को संबोधित किया.
चुनाव नतीजे आने के बाद राजे ने प्रेस कांफ्रेंस करते हुएर कहा, 'PM मोदी की गारंटियों की वजह से हमने चुनाव जीता'. दूसरे दिन खबर आई कि कई विधायक उनसे मिलने आए हैं. मीडिया ने विधायकों को गिना तो कुल 40 से ज़्यादा विधायक थे, जो उनसे मिलने आये थे.
सभी जानते हैं कि मोदी-शाह की जोड़ी वाली युग में भाजपा मुख्यमंत्रियों की नियुक्ति के मामलों में अक्सर आश्चर्यचकित करती रही है, लेकिन लगातार तीन राज्यों में नए मुख्यमंत्रियों को बनाने में एक पैटर्न साफ नज़र आता है और वो है आरएसएस बैकग्राउंड होना..वसुंधरा के मामले में कम से कम यह पैटर्न बिल्कुल भी पक्ष में नहीं था.
भजनलाल शर्मा भी आरएसएस के कार्यकर्ता रहे हैं. मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में OBC और ST को मुख्यमंत्री बनाने के बाद अब राजस्थान में सवर्ण को मौक़ा देना था. भजन ब्राह्मण हैं. करीब 33 साल बाद राजस्थान में कोई ब्राह्मण मुख्यमंत्री बना है. भाजपा ने राजपूतों और दलितों को साधने के लिए दो डिप्टी CM तो बनाए गए, लेकिन जाट गुर्जरों और मीणा समुदाय को प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाया इसलिए यह समीकरण भाजपा को महंगा भी पड़ सकता है. ब्राह्मण राजपूत भाजपा के परम्परागत वोटर रहे हैं और जाट अधिकतर समय कांग्रेस को वोट करते हैं.
वसुंधरा को मुख्यमंत्री न बनाए जाने के बाद उनके भविष्य को लेकर भी कई तरह के सवाल हैं. इन सवालों का कोई यक़ीनी जवाब तो नहीं है, लेकिन सभी संभावनाएं राजे की इच्छाशक्ति पर निर्भर करती हैं. CM की घोषणा के बाद से वो चुप हैं. बस ट्विटर पर नए CM भजनलाल को बधाई दी है. अभी उन्होंने शिवराज सिंह चौहान की तरह यह नहीं कहा..मित्रों अब विदा ...जस की तस रख दीनी चदरिया.
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वसुंधरा राजे भाजपा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं उनके बेटे दुष्यंत सिंह झालावाड़ से लोकसभा सांसद हैं. हो सकता है राजे केंद्र में चली जाएं, लेकिन वहां भी उनके लिए कितनी ही जगह है ? और गईं भी तो उनकी भूमिका के बारे में कुछ भी स्पष्ट नहीं है.
राजे 2003 में पहली बार राजस्थान की मुख्यमंत्री बनीं,2008 में भाजपा चुनाव हारीं,फिर 2013 में उनके नेतृत्व में चुनाव लड़ा गया भाजपा जीती और वो मुख्यमंत्री बनीं. इस बार भाजपा जीती पर राजे का पता तक नहीं.वो सरकार में महज झालरापाटन की विधायक के तौर पर जानी जा रही हैं.