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'IIT' जोधपुर ने बनाया नैनोसेंसर, बीमारियों को पहचानने में मिलेगी मदद, मृत्यु दर कंट्रोल करने में भी होगा कारगर

इस तकनीक में स्वास्थ्य की निगरानी, रोग निदान और प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया ट्रैकिंग के लिए एक तीव्र और पॉइंट-ऑफ़-केयर तकनीक के रूप में उपयोग करने की अपार संभावनाएं भी हैं.

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'IIT' जोधपुर ने बनाया नैनोसेंसर, बीमारियों को पहचानने में मिलेगी मदद, मृत्यु दर कंट्रोल करने में भी होगा कारगर
फाइल फोटो

New invention of IIT Jodhpur: तकनीक के इस दौर में भारत की स्वदेश निर्मित तकनीक का पूरी दुनिया लोहा मानती है. ऐसी ही एक नई तकनीक जोधपुर में स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान 'IIT' ने एक नैनोसेंसर तकनीक को ईजाद किया है. यह नैनोसेंसर हमारे मानव शरीर के विभिन्न कोशिकाओं को नियंत्रित करने वाले प्रोटीन के एक समूह साइटोकिन्स का शीघ्र ही पता लगाने में सक्षम है. इसके डवलप से गंभीर बीमारियों जैसे कैंसर, संक्रामक रोगों और रुमेटोलॉजिकल पहले ही पता चल सकेगा. साथ ही रोगी के उपचार करने में काफी सहूलियत होगी. वहीं इसके अलावा लगातार बढ़ती मृत्यु दर को नियंत्रित करने में भी कारगर होगा. 

इसके अलावा इस तकनीक में स्वास्थ्य की निगरानी, रोग निदान और प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया ट्रैकिंग के लिए एक तीव्र और पॉइंट-ऑफ़-केयर तकनीक के रूप में उपयोग करने की अपार संभावनाएं भी हैं. यह शोध बायोसाइंस और बायोइंजीनियरिंग विभाग की अकिलैंडेश्वरी बी, इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग विभाग के सरवर सिंह, इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर और प्रमुख डॉ. अजय अग्रवाल और बायोसाइंस और बायो इंजीनियरिंग की प्रोफेसर डॉ. सुष्मिता झा द्वारा किया गया है जो 2023 आईईईई एप्लाइड सेंसिंग कॉन्फ्रेंस में आईआईटी जोधपुर में प्रकाशित किया गया.

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फंगल संक्रमण के शुरुआती चरण का त्वरित निदान

IIT जोधपुर द्वारा ईजाद इस तकनीक और इसके भविष्य के दायरे के बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए IIT जोधपुर के विद्युत अभियांत्रिकी विभाग के प्रोफेसर डॉ. अजय अग्रवाल ने बताया कि 'यह तकनीक जो वर्तमान में अपने विकास के चरण में है और उत्साहजनक परिणाम प्रदान किए हैं. जिसमें तीन बायोमार्कर यानी इंटरल्यूकिन-6 (IL-6), इंटरल्यूकिन-B (IL-B), और TNF-a हैं जो प्रमुख प्रो-इंफ्लेमेटरी साइटोकिन्स हैं. ये साइटोकिन्स उत्तेजक / सूजन और जलन (inflammatory) कोशिकाओं द्वारा उत्पन्न होते हैं. अभी तक, परीक्षण नियंत्रित नमूनों के लिए किया जाता है, लेकिन टीम का लक्ष्म जल्द ही टेक्नोलॉजी को चिकित्सा परीक्षण में ले जाना है. समूह इस तकनीक का उपयोग सेप्सिस और फंगल संक्रमण के प्रारंभिक चरण और त्वरित निदान के लिए पहचान प्रोटोकॉल विकसित करने के लिए भी कर रहा है.

कम लागत व मात्र 30 मिनट में होगी जांच

आईआईटी जोधपुर में ईजाद यह सेंसर कम सांद्रता पर भी एनालिटिक्स का पता लगाने के लिए सरफेस एन्हांस्ह रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी का उपयोग करता है. यह सेमीकंडक्टर प्रक्रिया टेक्नोलॉजी पर आधारित है, और सरफेस एन्हांस्ह रमन स्कैटरिंग (SERS) के सिद्धांत पर काम करता है. इसलिए यह इस तकनीक को उच्च सटीकता / परिशुद्धता (High Precision) और चयनात्मकता के साथ ट्रेस-स्तरीय अणुओं (Trace level molecules) का पता लगाने में शक्तिशाली और सक्षम बनाता है.

समय और खर्चे दोनों होंगे कम

साइटोकिन का पता लगाने के लिए वर्तमान में सबसे व्यापक रूप से उपयोग की जाने वाली तकनीकें एंजाइम-लिंक्ड इम्युनोसॉरबेंट परख (ELISA) और पोलीमरेज चेन रिएक्शन (PCR) हैं. लेकिन ये विधियां बहुत समय लेती हैं और महंगी होती हैं. हालांकि आईआईटी जोधपुर द्वारा विकसित सेंसर इसकी तुलना में केवल 30 मिनट का समय लेता है और लागत कम आती है. 

वहीं इसकी कई खूबियां है जिसमे यह सेंसर, तेज और सटीक डेटा प्रोसेसिंग और विश्लेषण के लिए एआई के साथ संयोजन में किया जाता है. किसी व्यक्ति की ऑटोइम्यून बीमारियों और जीवाणु संक्रमण का तेज और अधिक मजबूत निदान प्राप्त करके यह सेंसर रोगी के चिकित्सा उपचार को बदलने की क्षमता रखता है. इस तरह किसी मरीज की बीमारी का निदान किया जा सकता है और भविष्य में उसके इलाज के लिए मार्गदर्शन करने के लिए तुरंत ट्रैक किया जा सकता है.

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