Rajasthan News: राजस्थान के अजमेर में स्थित ऐतिहासिक आनासागर झील को उसके पुराने और प्राकृतिक स्वरूप में लौटाने की दिशा में प्रयास तेज हो गए हैं. इस पहल को लेकर वासुदेव देवनानी ने हाल ही में झील क्षेत्र का दौरा किया. उनके साथ संभागीय आयुक्त और नगर निगम प्रशासक शक्ति सिंह राठौड़ भी मौजूद रहे. अधिकारियों के साथ मौके पर चर्चा करते हुए झील की वर्तमान स्थिति का जायजा लिया गया और इसके पुनर्जीवन के लिए जरूरी कदमों पर विचार किया गया.
इस दौरान झील की गहराई बढ़ाने के लिए झील से लगभग एक मीटर तक जमी मिट्टी निकालने की योजना पर चर्चा हुई. इसके लिए करीब 78 करोड़ रुपये का प्रस्ताव तैयार कर अजमेर विकास प्राधिकरण को भेजा गया है. योजना के तहत झील के अलग-अलग हिस्सों से गाद और कृत्रिम रूप से डाली गई मिट्टी को हटाया जाएगा ताकि झील की जलधारण क्षमता बढ़ सके. इससे बारिश के मौसम में अधिक पानी झील में जमा हो सकेगा और इसका प्राकृतिक स्वरूप धीरे-धीरे बहाल होगा.
सेवन वंडर्स हटने के बाद नई योजना पर फोकस
झील के किनारे बने सेवन वंडर्स पार्क को हटाए जाने के बाद खाली हुई जमीन को भी झील के स्तर तक लाने की योजना बनाई जा रही है. अधिकारियों का कहना है कि इस क्षेत्र को भी झील के जलस्तर के अनुरूप विकसित किया जाएगा ताकि वहां भी पानी का भराव हो सके और झील का क्षेत्रफल पहले जैसा किया जा सके.
सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है आर्द्रभूमि का मामला
दूसरी ओर झील और उसके आर्द्रभूमि क्षेत्र को लेकर मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है. इस संबंध में याचिकाकर्ता अशोक मलिक ने ग्रीन बेल्ट और झील की आर्द्रभूमि सीमा को लेकर याचिका दायर की है. उनका कहना है कि राज्य सरकार ने 17 मार्च 2025 को दिए गए शपथ पत्र में छह महीने के भीतर सेवन वंडर्स हटाने का आश्वासन दिया था जिसकी पालना की जा चुकी है.
हालांकि झील की मूल गहराई बहाल करने और कृत्रिम मिट्टी हटाने का काम अभी बाकी है. याचिकाकर्ता का कहना है कि सरकार को 17 मार्च तक आर्द्रभूमि क्षेत्र की आधिकारिक घोषणा करनी होगी. ऐसा नहीं होने पर सर्वोच्च न्यायालय में अवमानना याचिका दायर की जा सकती है.
साथ ही यह भी कहा गया है कि झील को आर्द्रभूमि घोषित होने के बाद उसमें गिरने वाले सीवर के गंदे पानी को पूरी तरह रोकना अनिवार्य होगा क्योंकि इससे झील का पानी लगातार प्रदूषित हो रहा है और पर्यावरण नियमों के तहत भारी जुर्माने की स्थिति भी बन सकती है.
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