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This Article is From Mar 01, 2026

Barmer News: राजस्थान के बाड़मेर में 84 साल के सुलेमान सिखा रहे होली जी गैर, भाईचारे की अनोखी  मिसाल

Barmer News: सुलेमान चाचा बताते हैं कि अभी रमजान का पाक महीना चल रहा है, इसलिए हम लोग दिन में रोजा रखते हैं. सदियों से हिंदू भाई हमें इफ्तारी करवाते हैं और उसके बाद रात को हम सब मिलकर गैर खेलते हैं

Barmer News: राजस्थान के बाड़मेर में 84 साल के सुलेमान सिखा रहे होली जी गैर, भाईचारे की अनोखी  मिसाल

Rajasthan News: देश की पश्चिमी सरहद पर पाकिस्तान सीमा से सटे बाड़मेर जिले में रमजान के पाक महीने और फाल्गुन के होली महोत्सव के दौरान हिंदू-मुस्लिम समुदाय के लोग सांप्रदायिक सौहार्द की अनूठी मिसाल कायम करते हुए एक साथ सामूहिक गैर नृत्य करते हैं. मुस्लिम समुदाय के लोग दिन में रोजा रखते हैं और रात होते ही हिंदू भाइयों के साथ पारंपरिक वेशभूषा में ढोल की थाप पर गैर खेलते हैं. सदियों से चली आ रही इस अनूठी परंपरा में 85 वर्षीय सुलेमान दोनों समुदायों की नई पीढ़ी को गैर नृत्य सिखाते हैं.

पश्चिमी राजस्थान के बाड़मेर जिले में बसा सोड़ियार गांव आजादी के बाद से ही हिंदू-मुस्लिम एकता और भाईचारे का जीता-जागता प्रतीक बना हुआ है. यहां सदियों पुरानी परंपरा है कि दोनों समुदाय के लोग न सिर्फ पड़ोसियों की तरह रहते हैं, बल्कि एक-दूसरे के त्योहारों में कंधे से कंधा मिलाकर शामिल होते हैं. यह गांव खासकर होली के पावन अवसर पर दुनिया भर में चर्चित हो जाता है, जहां हिंदू और मुस्लिम भाई एक साथ गैर खेलते हैं.

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रंग बरसाते हैं, थिरकते हैं और गले मिलते हैं

यह परंपरा कम से कम चार पीढ़ियों से चली आ रही है. होली के दिन गांव का मैदान एक रंगीन उत्सव में बदल जाता है. मुस्लिम युवा भी पारंपरिक ढोल-नगाड़ों के साथ गैर में शामिल होते हैं, रंग लगाते हैं और होली की बधाई देते हैं. यहां कोई भेदभाव नहीं, कोई ऊंच-नीच नहीं, सिर्फ इंसानियत और प्यार है. इसी को गंगा-जमुनी तहजीब की सच्ची मिसाल कहा जाता है, जहां त्योहार धर्म की दीवारें तोड़कर दिलों को जोड़ते हैं.

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सोड़ियार की यह खासियत सिर्फ होली तक सीमित नहीं है. इस गैर नृत्य का नेतृत्व मुस्लिम समुदाय से आने वाले 85 वर्षीय सुलेमान चाचा करते हैं, और उनकी चार पीढ़ियां, जिनमें उनका बेटा, पोता और पड़पोता भी शामिल हैं , उनके साथ गैर नृत्य करती हैं.

सुलेमान चाचा बताते हैं कि अभी रमजान का पाक महीना चल रहा है, इसलिए हम लोग दिन में रोजा रखते हैं. सदियों से हिंदू भाई हमें इफ्तारी करवाते हैं और उसके बाद रात को हम सब मिलकर गैर खेलते हैं. उनके नेतृत्व में इस अनूठे नृत्य ने वर्ष 1982 के दिल्ली एशियाड गेम्स में भी अपनी धूम मचाई थी.

पारंपरिक ढोल और थाली की थाप

गैरिये लाल-सफेद रंग की आंगी पहनकर पारंपरिक ढोल और थाली की थाप पर डांडिया के साथ नृत्य करते हैं. सोड़ियार गांव के दोनों समुदायों के लोग बताते हैं कि वे रोजमर्रा की जिंदगी में भी एक-दूसरे के साथ खड़े रहते हैं. शादी-ब्याह हो या सुख-दुख का समय, हर अवसर पर एकजुटता दिखाई देती है. यह आयोजन बाड़मेर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और भाईचारे का एक ज्वलंत उदाहरण है, जो सांप्रदायिक सद्भाव को सदियों से मजबूत करता आ रहा है.

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