दुनियाभर में भारत की पहचान गंगा-जमुनी तहजीब की है. यहां सदियों से हिंदू-मुस्लिम सहित सभी धर्मों के लोग प्रेम से साथ रहते हैं, यही भारत की संस्कृति है. महाशिवरात्रि पर राजस्थान के डीडवाना में कुछ ऐसा ही देखने को मिला, यहां महाशिवरात्रि पर एक ऐसी अनूठी परंपरा निभाई जाती है, जो हिंदू-मुस्लिम को एक डोर में बांधे रखती है. मुस्लिमों ने नाथ संप्रदाय के जुलूस का स्वागत किया और फूल बरसाए.
नाथजी ने मुस्लिमों को रोट भेंट किया
जोगामंडी धाम के नाथ संप्रदाय के महंत लक्ष्मण महाराज आज सुबह रथ पर सवार होकर गाजे-बाजे के साथ नगर भ्रमण के लिए निकले. चारो तरफ हर-हर महादेव के जयकारे गूंज रहे थे. जुलूस मुस्लिमों के मोहल्ले में पहुंचा, तो मुस्लिमों ने स्वागत किया. नाथजी ने लोगों को विशेष रोट भेंट किया. मान्यता है कि इस रोट को अनाज के साथ रखने पर घर में बरकत होती है, और कभी भी अन्न की कमी नहीं रहती है. अनाज का भंडार भरा रहता है.
मठाधीश को मुस्लिम पहनाते हैं पगड़ी
इस परंपरा में साथ एक खास बात और जुड़ी हुई है, जो सही मायने में सांप्रदायिक सौहार्द की जड़ों को मजबूत करती है. नाथ संप्रदाय के इस जोगा मंडी धाम में जब भी नाथ मठाधीश की नियुक्ति होती है, तब मुस्लिम समाज उन्हें पगड़ी पहनाता है, और माथुर समाज शॉल ओढ़ाता है, तब जाकर नए महंत की नियुक्ति होती है. यह परंपरा सदियों से चली आ रही है. दोनों धर्मों में भाईचारा बना हुआ है.
सांप्रदायिक सौहार्द की जीती जागती मिसाल
दोनों समुदायों के लोग न केवल इस परंपरा का पौराणिक तरीके से अनुसरण कर रहे हैं, बल्कि देश और दुनिया को भी सांप्रदायिक सद्भाव का संदेश दे रहे हैं. यह परंपरा दर्शाती है कि भारत की गंगा-जमुनी तहजीब आज भी जिंदा है, जो दुनिया को बताती है कि सभी भारतीय एक हैं. डीडवाना कि यह अनूठी परंपरा सच्चे अर्थों में सांप्रदायिक सौहार्द की जीती जागती मिसाल है.
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