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झालावाड़ स्कूल हादसे के बाद टूटे स्कूलों का अभी तक नहीं हुआ निर्माण, हजारों बच्चों की पढ़ाई पर संकट

राजस्थान के झालावाड़ जिले में जर्जर स्कूल भवनों के कारण 26 सरकारी स्कूलों को अन्य स्कूलों में शिफ्ट किया गया। लेकिन अभी तक पुराने स्कूल भवनों का काम पूरा नहीं है. बच्चे बहुत बुरे हाल में पढ़ाई कर रहे हैं.

झालावाड़ स्कूल हादसे के बाद टूटे स्कूलों का अभी तक नहीं हुआ निर्माण, हजारों बच्चों की पढ़ाई पर संकट
झालावाड़ जिले में जर्जर स्कूल भवनों का निर्माण अधूरा है.

Rajasthan News: राजस्थान झालावाड़ जिले में स्कूल हादसा होने के बाद सरकार ने पूरे प्रदेश में जर्जर स्कूल हटाने के आदेश दिए थे. जिसके बाद प्रदेश में कई भवनों को तोड़ गया और काम शुरू किया गया. लेकिन अब सामने आया है कि जो स्कूल तोड़े गए उनका काम अभी भी पूरा नहीं है.

पूरे प्रदेश की बात तो अलग है, जिस जगह ये हादसा हुआ वहां 26 स्कूल हटाए गए, लेकिन वहीं पर अभी काम पूरा नहीं हुआ है. नतीजा यह कि सरकारी स्कूलों को पास के अन्य स्कूलों में स्थानांतरित करना पड़ा. इससे हजारों बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है उनकी सुरक्षा पर सवाल उठ रहे हैं और माता-पिता चिंतित हैं.

शिफ्ट होने वाले स्कूल और बच्चों की मुश्किलें

जानकारी के मुताबिक इन जर्जर स्कूलों के बच्चे अब 10 जनवरी से दूसरे स्कूलों में पढ़ेंगे. कई गांवों में बच्चों को 3 से 4 किलोमीटर दूर जाना पड़ेगा. शिक्षा विभाग के इस कदम से माता-पिता और गांव वाले नाराज हैं. ब्लॉक में कुल 26 स्कूल शिफ्ट किए गए हैं जिनमें से 13 ने औपचारिक विरोध दर्ज कराया है.

शिफ्ट होने वाले स्कूल हैं: कोटड़ा चमरगढ़, ताजपुरिया, चित्तौड़ा, ढाबा, कुंजरी, गोड़िया, हनोतिया, आफूखेड़ी, गुराड़खेड़ा, कंवरिया खेड़ी, भवानीपुरा, बिरजीपुरा, हमीरपुर, शोलाल का पूरा, तलाईबेह, टांडी तंवरान, बामलाबेह, बकबट पूरा, भामा का पूरा, गंगाहोनी, झिरी, गिरधरपुरा, खेड़ी बोर, कंजरी की टापरियां, मोतीपुरा, रामपुरिया गुजरान.

विरोध दर्ज कराने वाले स्कूल

विरोध करने वाले 13 स्कूलों में शामिल हैं: ताजपुरिया, चित्तौड़ा, गुराड़खेड़ा, कंवरिया खेड़ी, बकबट पूरा, भामा का पूरा, गंगाहोनी, गिरधरपुरा, खेड़ी बोर, कुंजारा की टापरियां, बिरजीपुरा, झिरी. इनमें मुख्य शिकायतें दूरी ज्यादा होने बच्चों की सुरक्षा पर जोखिम परिवहन न होने और पढ़ाई बिगड़ने की हैं.

अभिभावकों की बढ़ती चिंताएं

माता-पिता कहते हैं कि छोटे बच्चों के लिए रोज इतनी दूर पैदल जाना मुश्किल है. खासकर शुरुआती कक्षाओं के बच्चे सड़कों से गुजरेंगे जहां वाहन चलते रहते हैं. इससे दुर्घटनाओं का डर है. पहले से ही सुरक्षा को लेकर मन में भय है और अब दूरी बढ़ने से यह डर और गहरा हो गया. कई परिवार गरीब हैं वे रोज बच्चों को गाड़ी से नहीं छोड़ सकते. गांवों में बस जैसी सुविधा भी कम है. इससे या तो बच्चे पैदल जाएंगे या माता-पिता काम छोड़कर साथ जाएंगे जिससे उनकी कमाई प्रभावित होगी.

पिपलोदी हादसे की दर्दनाक यादें

25 जुलाई को पिपलोदी में जर्जर स्कूल की छत गिरने से 7 मासूम बच्चों की जान चली गई और 23 घायल हुए. इस घटना ने सबको हिला दिया. उसके बाद विभाग ने खराब भवनों की पहचान की लेकिन तोड़कर नए बनाने में देरी हुई. आज भी यह यादें ताजा हैं जिससे माता-पिता स्कूल भेजने से पहले कई बार सोचते हैं.

पढ़ाई और परीक्षाओं पर पड़ रहा असर

स्कूल बदलने से बच्चों की रोज की पढ़ाई बाधित होगी. फरवरी से बोर्ड परीक्षाएं शुरू हैं. नए स्कूल नए टीचर और नया माहौल में ढलने में वक्त लगेगा. शिक्षक कहते हैं कि इससे बच्चों का ध्यान भटकेगा और सिलेबस पूरा करने में परेशानी आएगी. कई स्कूलों में पहले से क्लासरूम भरे हैं अतिरिक्त बच्चों से हालात और खराब हो सकते हैं.

समाधान की मांग और अधिकारी का बयान

माता-पिता और गांव वाले मांग कर रहे हैं कि गांव में ही अस्थायी सुरक्षित जगह मिले या बच्चों के लिए बस की व्यवस्था हो. स्थानीय नेता और शिक्षाविद कहते हैं कि केवल शिफ्ट करना काफी नहीं पुराने भवनों को जल्द तोड़कर नए मजबूत स्कूल बनें. जब तक नया न बने तब तक बच्चों की सुरक्षा और सुविधा पहले रखी जाए.

इस मामले पर कार्यवाहक ब्लॉक शिक्षा अधिकारी दुलीचंद लोधा ने कहा कि 26 स्कूलों को पास के स्कूलों में शिफ्ट किया गया है. 13 से विरोध आए हैं जो दूरी या अन्य वजहों से हैं. इन्हें ऊपरी अधिकारियों को भेज दिया गया है. जैसे ही आदेश आएंगे वैसा ही किया जाएगा.

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