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होलिका दहन पर बीकानेर में जलेंगी 2 हजार क्विंटल लकड़ियां, यहां होगा सबसे बड़ा आयोजन

रंगों का त्योहार होली बस कुछ ही घन्टों की दूरी पर है. आज रात 11 बजकर 14 मिनट पर जब होलिका दहन शुरू होगा और इसके साथ एक-दूसरे को अपने प्रेम में रंगने का सिलसिला भी शुरू हो जाएगा.

होलिका दहन पर बीकानेर में जलेंगी 2 हजार क्विंटल लकड़ियां, यहां होगा सबसे बड़ा आयोजन
होलिका दहन के तैयारियों की तस्वीर

Rajasthan News: बीकानेर शहर में भी इसके लिए जगह-जगह तैयारियां चल रही हैं. इस बार बीकानेर में करीब 250 जगहों पर होलिका दहन होगा और इसके लिए तकरीबन 2 हजार क्विंटल लकड़ी का इस्तेमाल किया जाएगा. इस कड़ी में राजपरिवार की ओर से जूनागढ़ किले और लालगढ़ पैलेस में अलावा 4 स्थानों पर होलिका दहन किया जाएगा. इन सभी जगहों पर करीब 60 क्विंटल लकड़ी इस्तेमाल होगी. वहीं शहर में होलिका दहन का सबसे बड़ा आयोजन साले की होली पर होगा. जहां 65 क्विंटल लकड़ियां इस्तेमाल होंगी. साले की होली के अलावा दम्माणी चौक, बारह गुवाड़, नत्थूसर गेट, जस्सूसर गेट, शीतला गेट और गोगागेट पर होलिका दहन किया जाएगा. 

पहले राजपरिवार फिर लोग करते हैं होलिका दहन

सबसे पहले जूनागढ़ किले में राजपरिवार की तरफ से होलिका दहन होगा. जो राज पंडित की ओर से किले की जनाना ड्योढ़ी में होता है और उसके बाद किले में रहने वाली महिलाओं के लिए भी होलिका दहन होता है. इन दोनों स्थानों पर होलिका दहन होने के बाद जूनागढ़ किले के बाहर 2 जगहों पर होलिका दहन होगा. यहां होलिका दहन होने के बाद शहर में ये सूचना दी जाती है कि राजपरिवार की तरफ से होलिका दहन हो चुका है. इसके बाद साले की होली नामक जगह पर होलिका दहन होगा. उसके बाद शहर में ये सिलसिला शुरू हो जाएगा.

साले की होली पर सबसे बड़ा होलिका दहन

बीकानेर शहर में सबसे बड़ा होलिका दहन साले की होली पर होता है. यहां 65 क्विंटल लकड़ियों का इस्तेमाल होली जलाने में किया जाता है. इसके लिए शालोजी वंश के मोहता परिवार की तरफ़ से 21 हजार रुपए दिए जाते हैं. बाकी खर्च इस इलाके में रहने वाले लोग मिल कर वहन करते हैं. साले की होली में दहन होने के बाद दम्माणी चौक में होली जलती है और यहां 35 क्विंटल लकड़ी प्रयोग में लाई जाती है. वहीं बारह गुवाड़ चौक में 21 क्विंटल, और नत्थूसर गेट पर 15 क्विंटल लकड़ी का इस्तेमाल होलिका दहन के लिए किया जाता है.

बीकानेर की होली अपने आप में अनूठी होती है और हर समाज के लोग इसमें हिस्सा लेते हैं. यही वजह है कि बीकानेर की साझा संस्कृति पूरी दुनियां में मिसाल है.

होलिका दहन की राख का इस्तेमाल

उधर एमएम स्कूल के पास रामदेव मन्दिर के पीछे गोबर के कंडों से होली जलाई जाती है. इसमें तकरीबन 20 हजार गोबर के कंडों का इस्तेमाल किया जाता है. इसमें 2 किलो कपूर भी मिलाया जाता है. लोग बताते हैं कि करीब सौ सालों से यहां होलिका दहन इसी रूप में किया जा रहा है. गोबर के कंडों में कपूर मिला देने से उसकी सुगंध हवा में फैल जाती है. होलिका दहन के बाद उसकी राख का इस्तेमाल भी लोग अपने शरीर के लिए करते हैं.

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