राजस्थान हाईकोर्ट ने दुष्कर्म से जुड़े दो मामलों में अहम फैसला दिया है. कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा है कि अगर विवाह वैध है और पत्नी बालिग है, तो वह अपने पति के खिलाफ दुष्कर्म (रेप) का मामला दर्ज नहीं करा सकती. कोर्ट ने ऐसे मामलों को कानून का दुरुपयोग बताते हुए दो अलग-अलग प्रकरणों में दर्ज एफआईआर रद्द कर दी. जस्टिस अनूप ढंढ की एकलपीठ ने कहा कि इस तरह की शिकायतें न्यायिक प्रक्रिया पर अनावश्यक दबाव डालती हैं, जिससे वास्तविक मामलों में न्याय मिलने में देरी होती है. अदालत ने कहा कि न्याय में देरी, न्याय से वंचित करने के समान है.
एक मामले में कोर्ट ने रद्द की दुष्कर्म की FIR
दरअसल, पहले मामले में जयपुर के एक दंपती ने अंतरजातीय विवाह किया था. विवाह के समय युवती बालिग थी. बाद में पारिवारिक विवाद के चलते मामला फैमिली कोर्ट पहुंचा, जहां तलाक की अर्जी दी गई. तलाक नहीं मिलने पर पत्नी ने पति पर दुष्कर्म का आरोप लगाते हुए एफआईआर दर्ज कराई और कहा कि उससे दबाव में दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कराए गए थे.
कोर्ट ने पाया कि विवाह सहमति से हुआ था और संभवतः परिवार की असहमति के कारण मामला दर्ज कराया गया. इस आधार पर एफआईआर रद्द कर दी गई. वहीं, दूसरे मामले में वर्ष 2020 में आर्य समाज में विवाह करने वाले दंपती का मामला सामने आया. इसमें पत्नी ने पति के खिलाफ एक ओर दुष्कर्म और दूसरी ओर दहेज प्रताड़ना का मामला दर्ज कराया.
दूसरे मामले को हाईकोर्ट ने बताया विरोधाभासी
अदालत ने इसे विरोधाभासी बताते हुए कहा कि दुष्कर्म का आरोप होने पर वैवाहिक संबंध से इनकार होता है, जबकि दहेज प्रताड़ना का मामला पति-पत्नी के संबंध पर आधारित होता है. ऐसे में दोनों आरोप एक साथ टिक नहीं सकते. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विरोधाभासी और आधारहीन शिकायतों के जरिए कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग स्वीकार्य नहीं है और ऐसे मामलों में सख्ती से कार्रवाई की जानी चाहिए.
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