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This Article is From Apr 15, 2026

"RAS अधिकारी नियुक्त होता तो राज्य बेच देता", सरकार की दलील पर पेपर लीक के आरोपी अफसर की जमानत रद्द

राजस्थान के चर्चित पेपर लीक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए आरएएस चयनित हनुमाना राम की जमानत याचिका खारिज कर दी. अदालत ने आरोपों को गंभीर मानते हुए किसी भी राहत देने से साफ इनकार कर दिया.

"RAS अधिकारी नियुक्त होता तो राज्य बेच देता", सरकार की दलील पर पेपर लीक के आरोपी अफसर की जमानत रद्द
सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए आरएएस चयनित हनुमाना राम की जमानत याचिका खारिज कर दी.

Rajasthan News: सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान लोक परीक्षा घोटाले से जुड़े मामले में बड़ा फैसला सुनाया है. न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने आरएएस चयनित हनुमाना राम की जमानत याचिका खारिज कर दी.

अदालत ने पहले नोटिस जारी किया था लेकिन राजस्थान सरकार की ओर से कड़ा विरोध दर्ज कराया गया. सरकार ने साफ कहा कि आरोपी का आचरण बेहद गंभीर है और उसे जमानत नहीं मिलनी चाहिए. अदालत ने राज्य के तर्कों को गंभीरता से लेते हुए राहत देने से मना कर दिया.

डमी अभ्यर्थी बनकर दी कई परीक्षाएं

जांच में सामने आया कि हनुमाना राम ने तीन लोगों के लिए डमी अभ्यर्थी बनकर परीक्षा दी. इसके अलावा उसने कई अन्य परीक्षाओं में भी प्रॉक्सी के तौर पर हिस्सा लिया. इनमें पुलिस सब इंस्पेक्टर भर्ती परीक्षा 2021 और पटवार भर्ती परीक्षा 2021 शामिल हैं.

आरोपी हनुमाना राम पढ़ाई में तेज माना जाता था. उसने आरएएस 2018 में 22वीं रैंक हासिल की थी और एक अन्य परीक्षा में दूसरी रैंक भी लाई थी. इसके बावजूद उस पर संगठित पेपर लीक गिरोह से जुड़े होने के आरोप लगे हैं.

जांच में सामने आई गहरी संलिप्तता

शुरुआती एफआईआर में आरोपी का नाम नहीं था लेकिन जांच के दौरान उसकी भूमिका सामने आई. इससे संकेत मिलता है कि वह किसी बड़े परीक्षा रैकेट का हिस्सा था और लगातार ऐसे अपराधों में शामिल रहा.

अदालत ने बताए गंभीर प्रभाव

राज्य सरकार ने तर्क दिया कि ऐसे कृत्य से प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता पर सीधा असर पड़ता है. अगर जिम्मेदार पद पर चयनित व्यक्ति ही ऐसा करें तो यह पूरे सिस्टम के लिए खतरा बन जाता है.

साथ ही राजस्थान सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि यदि याचिकाकर्ता आरएएस अधिकारी नियुक्त हुआ है तो वह राज्य को बेच देता. आगे अदालत ने कहा कि आरोपी का व्यवहार एक बार की गलती नहीं बल्कि लगातार किया गया अपराध है. ऐसे में आरोपों की गंभीरता को देखते हुए जमानत देना उचित नहीं है.

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