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रींगस में धुलंडी पर एक साथ न‍िकाली जाती है शव यात्रा और दूल्हे की बारात, वर्षों से चली आ रही परंपरा 

सोमवार देर रात गोपीनाथ राजा मंदिर में कस्बे वासियों की अहम बैठक हुई. आज जिसमें धुलंडी मनाने का निर्णय लिया.

रींगस में धुलंडी पर एक साथ न‍िकाली जाती है शव यात्रा और दूल्हे की बारात, वर्षों से चली आ रही परंपरा 
फाइल फोटो.

राजस्‍थान सहित देश भर में होली और धुलंडी मनाने के अलग-अलग तरीके हैं. कहीं कोड़ा मार होली, कहीं गैर वाली होली तो कहीं कई चंग की होली खेली जाती है. ऐसे ही अलग-अलग रंगों की विविधता में होली का एक रंग सीकर जिले के रींगस कस्बे में दिखाई देता है, जहां ऐतिहासिक होली मनाई जाती है, जो अपनी परंपरा को ज‍िंदा रखे हुए है. होलिका दहन के बाद अगले दिन सुबह 8 बजते-बजते कस्बे के सभी छोटे-बड़े युवा पुरुष रींगस नरेश कहे जाने वाले गोपीनाथ राजा मंदिर के सामने इकट्ठा होते हैं. और फिर यहां शुरू होती है रंग और गुलाल की होली. 

रंग-गुलाल उड़ेंगे 

इसके दौरान भजन का आयोजन होगा. सभी लोग एक दूसरे को जमकर रंग और गुलाल लगाएंगे. होली के गीतों पर युवा जबरदस्त तरीके से थिरकेंगे. दोपहर लगभग 1: 00 बजे तक यह दौर चलता रहेगा. उसके बाद मुर्दे और बारात की तैयारी शुरू होगी. कस्बे के किसी एक युवा को दूल्हा बनाया जाएगा और मुर्दे का प्रतीक भी तैयार किया जाएगा. कायदा हिंदू धर्म के अनुसार अर्थी तैयार की जाएगी. 

मुर्दे की शव यात्रा निकलेगी 

दोपह 1:30 से रंग और गुलाल की होली बंद हो जाएगी. यहां से फिर शुरू होगी मुर्दे की शव यात्रा, और इसके पीछे-पीछे दूल्हे की बारात न‍िकलेगी, जो ऊंट-घोड़े पर बैठकर निकाली जाएगी. इस यात्रा में शामिल होने वालों में कुछ लोग शव यात्रा के पीछे मातम मनाते चलेंगे तो कुछ लोग दूल्हे की बंदोरी के आगे नाचते गाते चलेंगे. वर्षें से यह पंरपरा चली आ रही है. मुर्दे की शव यात्रा समाज में व्याप्त बुराइयों के अंत के प्रतीक के रूप में निकाली जाती है, और दूल्हे की बारात आगे आने वाले वर्ष भर की खुशियों का प्रतीक होती है.

शव यात्रा श्मशान घाट तक जाएगी, और वहां मुर्दे को जला दिया जाएगा. इसके बाद भक्त प्रहलाद की आरती होगी. सभी लोग वापस गोपीनाथ राजा मंदिर के सामने आएंगे. एक दूसरे को गले लगाकर होली की बधाई देंगे.  

 आखिर क्यों शुरू हुई यह प्रथा

कालीदास स्वामी, स्वतंत्रता सेनानी (98) ने बताया क‍ि मुस्लिम समुदाय रींगस में ताजिया निकालना चाहता था, और हिंदू समुदाय में ताजिया निकालने के खिलाफ था, जिसको लेकर विवाद हो गया था. क्योंकि, रींगस में इससे पहले कभी भी ताजिए नहीं निकाले जाते थे. तब तय किया गया कि रींगस में मुर्दे की शव यात्रा निकलती है, इसलिए ताजिया यहां नहीं निकलना चाहिए. इसके बाद दोनों समुदाय के लोगों ने तय किया की रींगस में जब तक होली पर मुर्दे की शव यात्रा निकलती रहेगी, तब तक ताजिया नहीं निकाली जाएंगी, और तभी से यह प्रथा लगातार निभाई जा रही है.

नगर सेठ कहलाने वाले नाथूलाल काबरा का कहना है कि हिन्दू धर्म को मजबूत और देशभर में खुशियां बनी रहे, इसलिए यह मुर्दे और बारात की यात्रा हमारे जन्म से पहले ही निकाली जा रही है. अब इसमें भजनों का कार्यक्रम और खान-पान जैसे नवाचार भी जुड़ गए हैं. पिछले 50 वर्षों से मुर्दे को तैयार कर रहे द्वारका प्रसाद बधालका ने बताया कि इस त्योहार को मनाने में जो आनंद है, वह अन्य किसी त्योहार को मनाने में नहीं आता. 

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