
Kumbh 2025: भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म में कुंभ मेला विशेष महत्व रखता है. कुंभ मेले को भारतीय संस्कृति की धरोहर के रूप में देखा जाता है. वैसे तो कुंभ भारत में चार स्थानों पर आयोजित होता है. जिसमें प्रयागराज (उत्तरप्रदेश), हरिद्वार (उत्तराखंड), उज्जैन (मध्य प्रदेश) और नासिक (महाराष्ट्र) शामिल हैं. इन चार जगहों पर कुंभ मेला आयोजित होने का पौराणिक मान्यता है. वैसे तो कुंभ कई तरह के होते हैं. जिसमें कुंभ, अर्धकुंभ, पूर्णकुंभ और महाकुंभ होता है. 2025 में प्रयागराज में कुंभ का आयोजन होने जा रहा है. लेकिन यह कौन सा कुंभ है आप अभी कंफ्यूजन दूर कर लें.
साल 2025 में हिंदू पंचांग के अनुसार पौष पूर्णिमा के साथ ही कुंभ शुरू होने वाला है. यानी यह 13 जनवरी 2025 से शुरू होगा. वहीं यह 26 फरवरी 2025 को महाशिवरात्रि के साथ ही समापन किया जाएगा. यानी यह कुंभ 45 दिनों तक चलने वाली है.
कुंभ, अर्धकुंभ, पूर्णकुंभ और महाकुंभ में अंतर
कुंभ हर 3 साल में एक बार आयोजित होता है. इसमें प्रयागराज, उज्जैन, हरिद्वार और नासिक में होता है. वहीं इन 3-3 साल में आयोजित होने वाले कुंभ में हर छठे साल होने वाला कुंभ अर्धकुंभ होता है जो प्रयागराज और हरिद्वार में लगते हैं. वहीं केवल 12 साल में प्रयागराज में आयोजित होने वाला कुंभ पूर्ण कुंभ मेला कहलाता है. हालांकि पूर्णकुंभ को भी महाकुंभ कहते हैं. लेकिन सबसे बड़ा महाकुंभ 144 साल में होता है जो केवल प्रयागराज में आयोजित होता है. साल 2013 में प्रयागराज में 144 साल बाद महाकुंभ लगा था. वहीं 12 साल बाद इस बार 2025 में प्रयागराज में पूर्णकुंभ लगने वाला है.

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कौन सा कुंभ कब होगा इसकी भी है मान्यता
ऐसी मान्यता है कि कुंभ राशि में जब बृहस्पति का प्रवेश होने पर और मेश राशि में सूर्य का प्रवेश होने पर हरिद्वार में कुंभ आयोजित होता है. जबकि मेष राशि के चक्र में बृहस्पति-सूर्य और चंद्र के मकर राशि में प्रवेश करने पर अमावस्या के दिन प्रयागराज में कुंभ आयोजित होता है. इसके अलावा सिंह राशि में बृहस्पति के प्रवेश होने पर कुंभ गोदावरी के तट पर नासिक में होता है. जबकि सिंह राशि में बृहस्पति और मेश राशि में सूर्य का प्रवेश होने पर उज्जैन में कुंभ आयोजित होता है.

कुंभ में क्यों है शाही स्नान का महत्व
कुंभ मेले के आयोजन की कथा समुद्र मंथन से जुड़ी है. समुद्र मंथन के दौरान अमृत प्राप्ति हुई थी लेकिन इस अमृत कलश के लिए देवताओं और असुरों के बीच 12 दिन संघर्ष चला था. इसी 12 दिन को धरती पर 12 साल माना जाता है. संघर्ष के दौरान 12 जगहों पर अमृत की बूंद गिरी थी इसमें चार बूंद धरती पर गिरी थी. जिसे आज हम प्रयगाराज, उज्जैन, हरिद्वार और नासिक के नाम से जानते हैं. इन जगहों पर कुंभ मेला आयोजित होता है और इस दौरान नदियों का जल अमृत के समान माना जाता है. यही वजह है कि कुंभ में नदी में स्नान के लिए श्रद्धालुओं का तांता लगता है. प्रयागराज में तीन नदियों का संगम है जिसमें गंगा, यमुना और सरस्वती नदी है इस वजह से इसका विशेष महत्व माना जाता है. ऐसा कहा जाता है कि स्नान करने से पापों से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति होती है.