Gavri of the mewar bhils: राखी के अगले दिन यानी रविवार (10 अगस्त) से भील समुदाय का "गवरी" नृत्य शुरू हो गया है. दुनिया की प्राचीन पवर्तमालाओं में गिनी जानेवाली अरावली की गोद में बसे मेवाड़-वागड़ अंचल में भील समुदाय गवरी खेलता है, जिसे लोक संस्कृति के जानकार दुनिया के पुराने नृत्यों में से एक बताते हैं. इसमें नाच, गान और वादन तीनों ही रूप नजर आते हैं. गवरी के प्रमुख पात्रों में बूडिया ( भुड़िया, भूड़लिया, वयोवृद्ध या कलजयी), लज्जा और धज्जा राई (इच्छा और क्रिया रूप शक्तियां) शामिल हैं. ये पात्र अपने शरीर के कंधे, सीना, घुटने, पांव को भी आग के ऊपर से निकालता है. गवरी को सिर्फ नृत्याभिनय के तौर पर नहीं देखा जाता है, बल्कि यह तपस्या भी है. इसमें कलाकार 40 दिन तक नहाते नहीं है. दिन में एक बार भोजन और हरी सब्जी, मांस-मदिरा के सेवन से भी दूर रहते हैं. कलाकार जमीन पर सोने जैसे नियमों का पालन करते हैं.