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गुरुकुल में स्वस्थ क्रांति के सूत्र

डॉ. क्षिप्रा माथुर
  • विचार,
  • Updated:
    मार्च 31, 2026 16:42 pm IST
    • Published On मार्च 31, 2026 16:42 pm IST
    • Last Updated On मार्च 31, 2026 16:42 pm IST
गुरुकुल में स्वस्थ क्रांति के सूत्र

दशक भर पहले गुजरात के एक गुरुकुल में बहुत मेधावी और ऊर्जावान बच्चों से मिलना हुआ. तब तीन ही प्रश्न थे मन में: क्या इस गुरुकुल पद्धति को देश में मान्यता है? ये विद्यार्थी, यहाँ से बाहर निकलकर दुनिया से तालमेल बैठा पाएंगे और क्या रोज़गार पाएंगे? और यहाँ पढ़ाने वाले आचार्यों की आजीविका कितनी सुरक्षित है? जब इन बच्चों को धोती पहने हुए, मलखम्भ करते, हर बात का जवाब पूरी सतर्कता और समझ से देते हुए और वैश्विक प्रतिस्पर्धाओं में गणित का लोहा मनवाते हुए देखा, तो सोच में आया कि सरकार इन्हें पोषित करने और मान्यता देने से आख़िर कतरा क्यों रही है?

इन प्रश्नों के उत्तर ढूँढते हुए, वहाँ वैदिक गणित पढ़ाने वाले युवा आचार्य जय राठौड़ से चर्चाओं के कई दौर चले, बाद तक चलते रहे. इनका उत्साह और समर्पण देखकर लगा कि गुरुकुल व्यवस्था पर इन जैसे युवाओं का अटल भरोसा, भविष्य का भारत तैयार कर सकता है. पर इसके लिए इन्हें व्यवस्था का साथ, नई तकनीक का सहयोग और भारतीय ज्ञान को आजीविका से जोड़ने का व्यवस्थित स्वरूप तो चाहिए. उस वक्त, गुजराती भाषा में संचालित बच्चियों का गुरुकुल देखकर भी बहुत आश्वस्ति नहीं हो पाई, ये सब आधुनिक शिक्षा और दुनियादारी से छूटे हुए से लगे. 

वैसे, सरलता और सादगी को हम पिछड़ा मानने की गलती बरसों से करते रहे हैं. फिर भी, एक पंथ विशेष की छत्रछाया में संचालित इन गुरुकुलों में पढ़ाने वाले आचार्यों की दुविधा समझ में आने लगी. एक तरफ़ गुरुकुल पद्धति में शास्त्र सम्मत आचार-व्यवहार-अनुशासन का आग्रह रखने वाले आचार्यगण हैं तो दूसरी ओर पूँजी लगाने वाले प्रबंधक, जो अपनी पंथिक रीतियों को गुरुकुलों पर थोपना चाहते हैं. ठीक वैसे ही जैसे निजी शिक्षण संस्थानों में देखने को मिलता रहा है. भारत की ज्ञान परंपराओं के ये अवरोध और अंतर्विरोध ‘पूँजी और ज्ञान' के घर्षण को पैदा करते हैं जबकि ये एक दूसरे के पूरक हुआ करते थे. पूँजी का प्रश्रय न होता, तो ज्ञान भी कैसे पनपता. राजशाही का भी वही दौर उत्कर्ष और सम्मानजनक का रहा जहाँ विद्वजों और नीति को सम्मान मिला. 

सरलता और सादगी को हम पिछड़ा मानने की गलती बरसों से करते रहे हैं. फिर भी, एक पंथ विशेष की छत्रछाया में संचालित इन गुरुकुलों में पढ़ाने वाले आचार्यों की दुविधा समझ में आने लगी. एक तरफ़ गुरुकुल पद्धति में शास्त्र सम्मत आचार-व्यवहार-अनुशासन का आग्रह रखने वाले आचार्यगण हैं तो दूसरी ओर पूँजी लगाने वाले प्रबंधक, जो अपनी पंथिक रीतियों को गुरुकुलों पर थोपना चाहते हैं.

मान्यता से आजीविका

आज दशक भर बाद, सरकार की बनाई नई व्यवस्थाओं और नई शिक्षा नीति में गुरुकुल प्रणाली को मिली मान्यता और महत्व को करीब से देखकर लगा, देश में बहुत कुछ बदला है. जहाँ दुनिया कुछ उन्मादियों के कारण युद्ध में खिंचती चली जा रही है, वहीं भारत के जिज्ञासु-नवाचारी युवा, देश की जड़ों को सींचने के लिए नए बीज बो रहे हैं. नई शिक्षा नीति लागू होने के बाद के सालों में संस्कृत, भारतीय ज्ञान परंपरा और अन्य पाठ्यक्रमों ने अपनी जगह बनाई है. लोगों की रुचि भी बढ़ी है. गुरुकुल के विद्यार्थियों के लिए खोली गई नई खिड़कियों ने ये संभावना पैदा की है कि भारतीय ज्ञान को शासन-प्रशासन के ताने-बाने में अपनी सही जगह मिल पाए. जहाँ से वो अपने भविष्य की ज़मीन तैयार करने में सक्षम हो सकें और नई तकनीक से तालमेल कर, अनंत संभावनाओं को आकार भी दे सकें. ये बात आगे बढ़ाने से पहले गुरुकुल के इतिहास को भी थोड़ा याद कर लें.

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लाखों ध्वस्त, फिर भी बचे

अवन्तिका यानी उज्जैन नगरी में ऋषि संदीपनी के आश्रम में कृष्ण और बलराम ने 64 कलाएं और 14 विद्याएँ सीखीं थी. ज्ञान और कलाओं से परिपूर्ण व्यक्तित्व ही नेतृत्व की योग्यता रखा करते थे. इस बात का उल्लेख धर्मपाल की लिखी ‘द ब्यूटीफुल ट्री' में मिलता है कि साल 1830 में भारत में 7,32,000 गुरुकुल हुआ करते थे. फिर ब्रिटिश सत्ता को लार्ड मैकाले और थॉमस मुनरो के किए सर्वे ने ये बात समझा दी कि भारत को ग़ुलाम बनाने में ये ‘संस्कृति' ही असल अड़चन है. तभी से गुरुकुल शिक्षा को ध्वस्त करने के लिए उनके अनुदान बंद करने का फ़ैसला लिया गया. 

देश को अंग्रेज़ों के हुक्म की तामील करने और ग़ुलाम बनने लायक़ बनाने के लिए, अंग्रेज़ी विचार से ओत-प्रोत शिक्षा लागू की गई. अंग्रेज़ों की नक़ल करने और वैसी ही जीवनशैली वाला एक संभ्रांत वर्ग तैयार हुआ, और हुकूमत के बताए काम को ठीक से अंजाम देने वाला बाबू वर्ग. समाज में जितने विभेद पैदा कर सकते थे, शिक्षा और अंग्रेज़ परस्त मानसिकता के ज़रिए किए गए. 

ब्रिटिश हुकूमत ख़त्म होने के बाद भारत के हाथ में आई शासन व्यवस्था ने नवंबर 1989 में ‘राष्ट्रीय मुक्त विद्यालय' यानी एनआईओएस की स्थापना इसीलिए की थी, कि भारतीय शिक्षण प्रणाली को जीवित रखा जाये. लेकिन न इसके प्रति कोई गंभीरता बरती न जागृति की कोई कोशिश की. तब तक गुरुकुल व्यवस्था तो छिन्न-भिन्न हो ही चुकी थी. जहाँ जीवित थी, वहाँ सिर्फ़ उस चेतन समाज के बूते, जिसे अपनी धरोहर को खोना मंज़ूर नहीं था. जिन्हें अपनी गुरुकुल शिक्षा पद्धति में अपने अस्तित्व की झलक दिखाई देती थी, उन्होंने जी-जान लगाकर इसे जीवित रखा. देश के अलग अलग हिस्सों में, कई विलुप्त हो रही विद्याओं, विधाओं और कलाओं को सहेजने और संवारने का काम होता रहा. 

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गुरुकुल' के ‘सेतुबंध'

सरकार ने स्वदेशी शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए 2022 में ‘भारतीय शिक्षा बोर्ड' बनाया जिसका दायित्व ‘पतंजलि योगपीठ' को सौंपा गया. इसके ज़रिए विद्यालय, गुरु-शिष्य परंपरा और गुरुकुल तीनों को मान्यता दी जा रही है. आधुनिक शिक्षा में भारतीय ज्ञान का समावेश कर नए पाठ्यक्रम तैयार करना और वैश्विक नेतृत्व तैयार करना भी इसका लक्ष्य है. उच्च शिक्षा के लिए भी सरकार ने ‘सेंट्रल संस्कृत यूनिवर्सिटी' (सीएसयू) में कई कोर्स शुरू किए हैं जो खास तौर से गुरुकुल के विद्यार्थियों को ध्यान में रखकर ही बनाए गए हैं.

आयुर्वेद, लॉ, और प्रशासनिक सेवाओं तक में गुरुकुल के विद्यार्थियों को प्रवेश मिले, ये तैयारी है. आयुर्वेद चिकित्सक बनने के लिए नीट परीक्षाओं की तर्ज पर अब ‘आयुर्वेद प्रोग्राम एंट्रेंस टेस्ट' होगा. विश्वविद्यालयों में ‘आयुर्वेद गुरुकुलम' भी खुलेंगे, जिसकी शुरुआत नासिक और दिल्ली के परिसरों से होगी. ‘सेतुबंध' नाम की योजना गुरुकुल को फिर से प्रतिष्ठित करने का बड़ा कदम है. सीएसयू की इस योजना में गुरुकुल के विद्यार्थी आईआईआईटी में रिसर्च कर सकेंगे साथ ही और भी कई कोर्स चुन सकेंगे. उनके प्रोत्साहन के लिए छात्रवृत्ति का प्रावधान भी किया गया है. ये योजना पारंपरिक गुरुकुल शिक्षा हासिल करने वाले विद्यार्थियों को औपचारिक डिग्री के बिना ही आईआईटी, आईसर और अन्य शीर्ष तकनीकी संस्थानों में शोध करने का मौक़ा देती है. छठी से बारहवीं के बच्चों के लिए भी इसी सत्र से पाठ्यक्रम शुरू हो रहे हैं जो एनसीईआरटी से मान्यता प्राप्त होंगे.

राजस्थान के ही नागौर इलाके के युवा जय भी आधुनिक विज्ञान के विद्यार्थी रहे और ‘वैदिक गणित' की गहराई से अनजान ही थे. पर जब विधिवत सीखा तो गुरुकुल परंपरा और वैदिक ज्ञान के आकर्षण ने उन्हें इतना खींचा कि इसे ही जीवनशैली में उतार लिया और फिर अपनी आजीविका का स्रोत भी इसे ही बनाया.

वर्चुअल गुरुकुल' और देहात

राजस्थान के ही नागौर इलाके के युवा जय भी आधुनिक विज्ञान के विद्यार्थी रहे और ‘वैदिक गणित' की गहराई से अनजान ही थे. पर जब विधिवत सीखा तो गुरुकुल परंपरा और वैदिक ज्ञान के आकर्षण ने उन्हें इतना खींचा कि इसे ही जीवनशैली में उतार लिया और फिर अपनी आजीविका का स्रोत भी इसे ही बनाया. गुरुकुल में पढ़ाते हुए करीब डेढ़ दशक में ही उन्होंने सैंकड़ों विद्यार्थियों को भारतीय गणित की परंपरा से जोड़ दिया. साथ ही इस मिथक को भी तोड़ दिया कि आधुनिक विषयों और मुख्यधारा की शिक्षा व्यवस्था से जुड़ने में गुरुकुल कोई अड़चन है. उनकी पढ़ाई एक बच्ची गुरुकुल में शिक्षा लेकर ही चार्टर्ड अकाउंटेंट बनी है, अन्य हैं जो विज्ञान की पढ़ाई कर रही हैं, कई बच्चे योग विज्ञान में डिग्री हासिल कर चुके हैं. विदेशों में बसे भारतीय मूल के युवा भी भारतीय ज्ञान में रुचि लेकर इसमें संभावना देख रहे हैं. 

‘सेतुबंध' योजना से भी उनके गुरुकुल में पढ़ी एक बच्ची आईआईटी में चुनी गई है. उनके पढ़ाए अनेक विद्यार्थी, भारतीय ज्ञान में ही पारंगत होकर, अच्छा धनार्जन कर रहे हैं. कई स्थानों पर नए गुरुकुल की स्थापना में मदद कर रहे जय, आचार्य की भूमिका में रहते हुए, ‘वर्चुअल गुरुकुल' की रूपरेखा तैयार कर रहे हैं. ये देखकर लगा प्रतिभा का इतना निश्चल और दृढ़ प्रयोग, रोज़गार सृजन के कई रास्ते खोलेगा. एआई की उपयोगिता ऐसे नवाचारों में असीम है जो बहुरंगी देश और विश्व को जोड़कर, प्राचीन ज्ञान को जीवंत रूप दे सकती है. कोई भी नया गुरुकुल खुले तो वहाँ भाषा-विज्ञान की लैब हो और गुरु-शिष्य परंपरा को साकार करने वाला माहौल हो, इतनी अपेक्षा तो आचार्यों की है ही. सपना ये भी है कि एक ही गुरु के पढ़ाये हुए शिष्य, उन विद्यार्थियों को भी पढ़ायें जो गुरुकुल में आकर नहीं पढ़ सकते. 

कुछ सालों से लगातार इस काम पर नज़र रखते हुए, अब जाकर ये लगने लगा है कि जय जैसे अनेक युवा, देहात की अर्थव्यवस्था को नया स्वरूप देने में पूरी तरह सक्षम हैं. उन्हें और समर्थ करने का मार्ग तुरंत खुलना चाहिए. गाँव-कस्बों के युवक-युवतियां आधुनिक और प्राचीन ज्ञान को साध कर इसे जीवन समृद्ध करने में लगायेंगे, तो अर्थ के समीकरण भी बदलते देर नहीं लगेगी. योजना तो महिलाओं को घर बैठे ज्योतिष, गणित, आयुर्वेद, योग जैसे विषयों की पढ़ाई करवाकर, उन्हें कमाई और आजीविका के लिए तैयार करने की भी है. स्वावलंबन से ही स्वाभिमान बचे रहना संभव होगा. ‘वर्चुअल' गुरुकुल देश में हो रही स्वस्थ और सूक्ष्म क्रांति है, जिसका सबसे ज़्यादा फ़ायदा, महिलाओं की भागीदारी से ही मिलेगा. आख़िर, बात सिर्फ़ जीडीपी में उछाल की नहीं, बल्कि अर्थतंत्र के भारतीय पैमाने गढ़ने की भी है.

परिचयः डॉ. क्षिप्रा माथुर जयपुर स्थित स्वतंत्र पत्रकार हैं जो मीडिया और अध्यापन में तीन दशकों से सक्रिय हैं. अपने लेखन और वक्तव्यों में उन्होंने विभिन्न सामाजिक-राजनीतिक विषयों को उठाया है, जिनमें समाज के उपेक्षित तबकों और उनके मुद्दों की विशेष रूप से चर्चा की गई है. भारत के चुनाव आयोग ने उन्हें नेशनल मीडिया अवॉर्ड से सम्मानित किया है. 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं.

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