
राजस्थान की एक मात्र नवाबी रियासत रही टोंक गंगा-जमीनी तहजीब का शहर है. वही टोंक में मौजूद अरबी फारसी संस्थान में अरबी- फ़ारसी भाषा के अनुपम ग्रंथों का यह संग्रह नवाबी रियासत के समय की वह यादगार निशानी है. जब टोंक की सरज़मीं से नालन्दा और तक्षशिला के समान ज्ञान की गंगा बहती थी और दूर-दूर के लोग यहां शिक्षा ग्रहण करने आते थे. वक्त बदला पर निशानियों के रूप में यह संग्रहालय आज भी ज्ञान की सरिता बहा रहा है. इसमें मौजूद अरबी फारसी के दुर्लभ ग्रंथ और सिक्कों के साथ ही अब यहां मौजूद है दुनिया के सबसे बड़े साइज का कुरान मजीद. जिसे देखने लोग दूर-दूर से आते हैं.
G-20 से पहले संस्थान का देश की महत्वपूर्ण संस्थाओं के बीच हुआ एमओयू
हाल ही में G-20 से पहले अगस्त महीने में इस संस्थान का देश की महत्वपूर्ण संस्थाओं के बीच एक एमओयू हुआ है. जिससे अरबी-फारसी शोध संस्थान की पहचान के साथ ही राज्य के कल्चर को भी बढ़ावा मिलेगा. टोंक के मौलाना अबुल कलाम आजाद अरबी फारसी शोध संस्थान सहित देश की इसी तरह की दो अन्य पुस्तक संस्थानों का त्रिपक्षीय गोल्डन ट्रायंगल बनाया गया है. जिसपर दिल्ली में राष्ट्रपति की मौजूदगी में आयोजित कार्यक्रम में तीनों ही संस्थाओं ने अधिकारियों ने हस्ताक्षर कर कला, संस्कृति एवं साहित्यक आदान प्रदान को अनुमति दी है.
अब इसका सीधा लाभ देश विदेश से आने वाले स्कॉलर्स को मिलेगा. वही आज इस संस्थान की सबसे बड़ी तकलीफ यह है कि सेवा नियमों के नहीं बनने से देश के चार प्रमुख संस्थानों में से एक यह संस्थान एकेडमिक स्टाफ की कमी से जूझ रहा है.
दुनियां का सबसे बड़ा क़ुरान मजीद
अरबी फारसी के इस महत्वपूर्ण संस्थान में हाल ही के बीते कुछ सालों पहले एक चीज़ महत्वपूर्ण यह रही कि यहां बनाया गया दुनिया का सबसे बडी साइज का कुरान यहां पंहुचने वाले पर्यटकों और शिक्षाविदों के लिए आकर्षण और जिज्ञासा का केंद्र बन गया.
इस कुरान को मौलाना जमील और उनके परिवार ने बनाया है.

टोंक का अरबी -फ़ारसी संस्थान
स्टाफ़ की कमी से जूझता संग्राहलय
लेकिन शहर के बुद्धिजीवियों का दर्द यह भी है कि स्टाफ की भारी कमी इसके विकास और विस्तार में बाधक है. जरूरत है कि सेवा नियम बने और यहां एकेडमिक स्टाफ के अलावा ट्रांसलेटर और अन्य स्टाफ की नियुक्ति हो, जिससे यह संस्थान और आगे बढ़कर देश ही नहीं दुनिया के अन्य मुल्कों तक अपनी छाप छोड़े .
कैलीग्राफी कला है प्रसिद्ध
अरबी फारसी के ग्रथों ओर सिक्कों के संग्रह को समेटे इसी संस्थान में एक महत्वपूर्ण कला जिसे कैलीग्राफी कहते है उस पर भी यहां बहुत काम हुआ है और प्रशिक्षण का दौर निरन्तर जारी है. शब्दों को अलग-अलग अंदाज में अलग डिजाइन और बेल बूटों और सुराइयों के आकार में लिखे जानी वाली इस केलीग्राफी की कला को नए कलाकारों के साथ आगे बढ़ा रहा है. देखने मे सुंदर तरीके से लिखने की कला को कैलीग्राफी कहा जाता है यह एक विज़ुअल आर्ट है और इसके कलाकार को केलीग्राफर कहते है. टोंक के केलीग्राफी के कलाकारों ने अपनी पहचान दुनियाभर में छोड़ी है .
नवाब मोहम्मद अली खां का कारनामा
जब शौक़े जुनूं सिर चढकर बोलने लगता है, तो यकीनन कुछ ऐसा कारनामें सामने आते हैं, जो दुनिया के लिए एक मिसाल बनता है. एक ऐसा ही शौक़े जुनूं राजस्थान की एक छोटी-सी रियासत टोंक के तीसरे नवाब मोहम्मद अली खां के सिर चढकर बोला और उन्होंने ऐसे-ऐसे दुर्लभ ग्रंथों का संग्रह किया, जो आज दुनिया के लिए किसी अजूबे से कम नहीं है. शान-ए-बनास, प्राचीन रहस्यों का जिला टोंक, पुस्तक में टोंक के तीसरे नवाब मोहम्मद अली खाँ की इल्मी विरासत के बारे में काफी कुछ जानकारी दी गई हैं .

दुनियां का सबसे बड़ा क़ुरान को इस तरह उठाते हैं लोग.
संग्रहालय में मौजूद हैं कई दुर्लभ ग्रंथ
टोंक का मशहूर अरबी-फारसी संस्थान में यूं तो 31 फनों के बेशुमार ग्रंथ उपलब्ध हैं, पर अरबी फारसी में रामायण,महाभारत और गीता के अलावा भी कुछ हस्तलिखित ग्रन्थ उल्ल्लेखनीय हैं. जिसमे एक कुरआन मजीद, यह ग्रंथ केवल तीस पन्नों पर आधारित है और लेकिन कला का उत्कृष्ट नमूना है.
कुरान शरीफ़ के शुरू के दो पेज स्वर्णिम है यहां क़ुरान की तफ़्सीर जादुल मसीर (तफसीर) मौजूद है. यह ग्रंथ अब्बासी खलीफाओं के संग्रहालय की शोभा बढ़ा चुका है. जब बगदाद का संग्रहालय बर्बाद हुआ तो यह किसी ज्ञानी के हाथ लग गया,यह अरबी भाषा का श्रेष्ठ नमूना है . वहीं संस्थान में फ़ारसी में लिखे गीता,महाभारत और रामायण भी मौजूद हैं.
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