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This Article is From Jan 05, 2026

ऊंट के फर्र कटिंग की कला है कठिन काम... बचें हैं गिने चुने कारिगर, ऊंट महोत्सव में होता है आकर्षण का केंद्र

फर्र कटिंग में ऊंट के शरीर पर बालों को बारीकी से कटिंग कर राजस्थानी मांडने और संस्कृति को इसके माध्यम से उकेरा जाता है. इस दौरान ऊंटों पर त्वरित मुद्दों के अलावा पर्यावरण बचाओं जैसे संदेश भी दिए जाते है.

ऊंट के फर्र कटिंग  की कला है कठिन काम... बचें हैं गिने चुने कारिगर, ऊंट महोत्सव में होता है आकर्षण का केंद्र
फर्र कटिंग करते कारिगर

Rajasthan Camel Festival: रेगिस्तान और ऊंट का गहरा संबंध इस रेगिस्तान में रहने वालों के जीवन में ऊंट उनके परिवार का सदस्य माना जाता है. बीकानेर में आयोजित होने वाले अंतराष्ट्रीय ऊंट उत्सव में यही ऊंट कई तरह के करतब दिखाता नजर आता है. इस आयोजन के दौरान विशेष रूप से फर्र कटिंग आकर्षण का केंद्र रहती है जो आने वाले हर पर्यटक को अपनी ओर खींचती है.

फर्र कटिंग कला अपने आप में खास

ऊंटो का अद्भुत करतब और डांस देखने सैलानी बड़ी संख्या में हर साल बीकानेर आते है. हर कोई इस खास लम्हे को अपने कैमरों में कैद जरूर करता है. इतना ही नहीं फर्र कटिंग कला अपने आप में खास होता है. हर साल जनवरी में होने वाला ऊंट उत्सव राजस्थानी फर्र कटिंग कला को जीवित रखे हुए है. ऊंट के शरीर पर बालों को बारीकी से कटिंग कर राजस्थानी मांडने और संस्कृति को इसके माध्यम से उकेरा जाता है. इस दौरान ऊंटों पर त्वरित मुद्दों के अलावा पर्यावरण बचाओं जैसे संदेश भी दिए जाते है.

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फर्र कटिंग की कला कर रही तीसरी पीढ़ी

ऊंट पालक मोहीन खान बताते है कि जब ऊंट उत्सव शुरू हुआ था तब से ही हमारा परिवार इसमें हिस्सा ले रहे है. हम इसमें शामिल होने वाली तीसरी पीढ़ी है. इसमें सबसे खास प्रतियोगिता फर्र कटिंग की ही होती है. इसके लिए एक महीने पहले ही तैयारी में जुट जाते है. पहले हमारे दादा जी फिर हमारे पिताजी चाचा जी इसमें भाग लेते थे इस हम भी इसमें शामिल हो रहे है. हमारी वाली पीढ़ी परिवार के बड़ों  से धीरे-धीरे खुद ने ही सीखी. ये कला काफी कठिन ने है. इसके लिए दिमाग से काम करना पड़ता है. क्योंकि थोड़ी बहुत गलती होते ही सब खत्म हो जाता है. ऊंट पर उकेरी गई प्रत्येक आकृति के पीछे कोई ना कोई संदेश छुपा हुआ होता है.

एक समय था जब इस अनूठी कला के लिए कारीगर काफी थे. उत्सव के दौरान भी बड़ी संख्या में ऊंट पालक पहुंचते थे. लेकिन इस कला के परंपरागत कारीगर अब अंगुलियों पर गिनने जितने मुश्किल से बचे है. ऐसे में ऊंट उत्सव के अलावा भी कोई कार्यक्रम होना चाहिए ताकि इस कला को जीवित रखा जा सके.

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