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Rajasthan: 16 साल से बंजर पड़ा बाड़मेर का मेली बांध, अवैध खनन और अतिक्रमण से नहीं हो रहा जल का ठहराव

करीब 100 साल पहले जोधपुर रियासत के द्वारा निर्मित इस बांध की भराव क्षमता 18 फीट है. लेकिन इसके केचमेंट इलाके में अतिक्रमण और जलभरण अव्यवस्था के चलते इसमें कभी कभार ही पानी का भराव होता है. 2007 में सरकार ने इसके जीर्णोद्वार और जलभरण को लेकर करीब 1 करोड़ की योजना स्वीकृत की थी. लेकिन सरकारी व्यवस्था की अनदेखी के चलते महज 25 लाख का कार्य ही हो पाया बाकी पैसे समयावधि पूरी होने पर लेप्स हो गए.

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Rajasthan: 16 साल से बंजर पड़ा बाड़मेर का मेली बांध, अवैध खनन और अतिक्रमण से नहीं हो रहा जल का ठहराव
दुर्दशा का शिकार मेली बांध

Barmer's Meli Dam: पश्चिमी राजस्थान में पानी की कीमत हर कोई जानता है, भीषण गर्मियों और अकाल की विभीषिकाऐं झेलने वाले पश्चिमी राजस्थान में पानी को लेकर कई कागजी योजनाए बनी और बन्द हो गईं. बालोतरा और बाड़मेर का एकमात्र मेली बांध भी सिर्फ कागजी योजनाओं तक ही सीमित होकर रह गया है. कभी आसपास के दर्जनों गांवों की प्यास बुझाने अउ खेती के लिए वरदान इस बांध की पिछले 16 सालों से कोई सुध नहीं ली जा रही है. छप्पन की पहाड़ियों की तलहटी में बना यह बांध अपनी दुर्दशा की कहानी बयान कर रहा है.

100 साल पहले हुआ था निर्माण 

करीब 100 साल पहले जोधपुर रियासत के द्वारा निर्मित इस बांध की भराव क्षमता 18 फीट है. लेकिन इसके केचमेंट इलाके में अतिक्रमण और जलभरण अव्यवस्था के चलते इसमें कभी कभार ही पानी का भराव होता है. 2007 में सरकार ने इसके जीर्णोद्वार और जलभरण को लेकर करीब 1 करोड़ की योजना स्वीकृत की थी. लेकिन सरकारी व्यवस्था की अनदेखी के चलते महज 25 लाख का कार्य ही हो पाया बाकी पैसे समयावधि पूरी होने पर लेप्स हो गए.

अवैध खनन की वजह से नहीं हो रहा जल का ठहराव 

उसके बाद एक जापानी कम्पनी ने इसके जीर्णोद्वार का बीड़ा उठाया. जिसके तहत बांध को भरने के लिए करीब 16 किलोमीटर दूर पिपलून गांव से नहर का प्रोजेक्ट बना. लेकिन वह कार्य भी आधा अधूरा ही रह गया और समय के साथ नहर भी क्षतिग्रस्त हो गई. वहीं बांध के पेटे से मिट्टी के अवैध खनन और ट्यूबवेल के कारण पानी का ठहराव नहीं पा रहा है.

कई साल पहले था जल का बड़ा स्रोत

स्थानीय किसानों का कहना है कि 1974 तक इस बांध के कारण यहां का जलस्तर काफी ऊंचा था और खेती और पीने के लिए एक मात्र स्रोत था. आज भी कई किसान इसके भराव क्षेत्र में खेतीबाड़ी करते हैं. लेकिन 1974 की अतिवृष्टि में यह बांध टूट गया और उसके बाद सरकार ने इसको रिपेयर भी करवाया. अब 20 साल से सरकार की अनदेखी के कारण यह प्राचीन बांध सिर्फ नाम का बांध है.

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