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प्राचीन ज्ञान को डिजिटल भविष्य से जोड़ रहा बीकानेर का अभय जैन ग्रंथालय,‘मन की बात’ में पीएम मोदी ने किया जिक्र

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात में बीकानेर के अभय जैन ग्रन्थालय की सराहना की. यहां लाखों पांडुलिपियों को डिजिटल रूप में सुरक्षित किया जा रहा है जो भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा को नई पहचान दे रहा है.

प्राचीन ज्ञान को डिजिटल भविष्य से जोड़ रहा बीकानेर का अभय जैन ग्रंथालय,‘मन की बात’ में पीएम मोदी ने किया जिक्र
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात में बीकानेर के अभय जैन ग्रन्थालय की सराहना की.

Rajasthan News: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने लोकप्रिय कार्यक्रम ‘मन की बात' में बीकानेर के अभय जैन ग्रन्थालय का उल्लेख करते हुए इसकी सराहना की. उन्होंने कहा कि यह ग्रन्थालय आज देश के प्रतिष्ठित ज्ञान भारतम् मिशन का अहम हिस्सा बन चुका है और भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा को आधुनिक तकनीक से जोड़ रहा है.

उन्होंने आगे बताया कि यह ग्रन्थालय सदियों पुरानी पांडुलिपियों का अनमोल संग्रह है. यहां दो लाख से अधिक दुर्लभ हस्तलिखित ग्रंथ सुरक्षित रखे गए हैं. इन पांडुलिपियों में वेद, उपनिषद, आयुर्वेद, ज्योतिष, दर्शन और इतिहास जैसे विषयों का अमूल्य ज्ञान समाहित है जो भारतीय सभ्यता की गहराई को दर्शाता है.

डिजिटल तकनीक से संरक्षण का काम तेज

Gyan Bharatam Mission के तहत इन पांडुलिपियों का वैज्ञानिक तरीके से संरक्षण किया जा रहा है. अत्याधुनिक स्कैनिंग तकनीक के जरिए इन्हें डिजिटल रूप में बदला जा रहा है ताकि यह ज्ञान सुरक्षित रहे और अधिक लोगों तक पहुंच सके. इसका उद्देश्य आमजन और शोधार्थियों को इस धरोहर तक आसान पहुंच देना है.

राजस्थान का पहला आधिकारिक संरक्षण केंद्र

अभय जैन ग्रन्थालय अब राजस्थान का पहला आधिकारिक पांडुलिपि संरक्षण केंद्र बन चुका है. यहां न केवल पुराने ग्रंथों को सुरक्षित रखा जा रहा है बल्कि उनके संरक्षण के लिए वैज्ञानिक तकनीकों का भी उपयोग किया जा रहा है. कई पांडुलिपियां इतनी पुरानी हैं कि उन्हें सुरक्षित रखने के लिए विशेष वातावरण की आवश्यकता होती है.

बहुभाषीय विरासत का अनूठा संगम

इस ग्रन्थालय की खासियत इसकी बहुभाषीय संग्रह संपदा है. यहां हिंदी, संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, राजस्थानी, गुजराती के साथ तमिल, कन्नड़, फारसी, उर्दू और सिंधी भाषाओं की पांडुलिपियां भी मौजूद हैं. यह इसे देश के सबसे समृद्ध सांस्कृतिक केंद्रों में शामिल करता है.

संस्थापकों की दूरदर्शिता का परिणाम

इस ग्रन्थालय की स्थापना अगरचंद नाहटा और भंवरलाल नाहटा ने की थी. आज उनके प्रयास आधुनिक तकनीक के साथ आगे बढ़ रहे हैं. प्रबंधन से जुड़े ऋषभ नाहटा के अनुसार यह पांडुलिपियां केवल कागज नहीं बल्कि हमारी सभ्यता की आत्मा हैं जिन्हें भविष्य के लिए सुरक्षित किया जा रहा है.

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