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'लिंग जांच का मतलब अबॉर्शन की साजिश नहीं', राजस्थान हाईकोर्ट ने निचली अदालत को फटकारा, डॉक्टर को दी आंशिक राहत

Rajasthan High Court Sex Determination Case: बांसवाड़ा की डॉ. अनामिका भारद्वाज को राजस्थान हाईकोर्ट से बड़ी राहत. कोर्ट ने कहा- लिंग जांच का मतलब गर्भपात की साजिश नहीं। जानें क्यों जस्टिस फरजंद अली ने निचली अदालत को 'पोस्ट ऑफिस' कहा. पूरी रिपोर्ट...

'लिंग जांच का मतलब अबॉर्शन की साजिश नहीं', राजस्थान हाईकोर्ट ने निचली अदालत को फटकारा, डॉक्टर को दी आंशिक राहत
'अदालत पुलिस का पोस्ट ऑफिस नहीं', राजस्थान HC की दो टूक; भ्रूण लिंग जांच मामले में डॉक्टर पर लगी गर्भपात की साजिश की धाराएं हटाईं
NDTV Reporter

Jodhpur News: राजस्थान हाईकोर्ट ने भ्रूण लिंग जांच (Sex Determination) के एक मामले में बांसवाड़ा की स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. अनामिका भारद्वाज को बड़ी राहत दी है. कोर्ट ने साफ कहा है कि किसी पर लिंग जांच का आरोप होने का मतलब यह कतई नहीं है कि उसने गर्भपात (Abortion) की साजिश भी रची थी.

मामला क्या था?

यह पूरा मामला करीब 7 साल पुराना है. 17 फरवरी 2017 को पीसीपीएनडीटी (PCPNDT) टीम ने एक 'डिकॉय ऑपरेशन' किया था. टीम ने एक गर्भवती महिला को फर्जी ग्राहक बनाकर डॉक्टर के पास भेजा. छापे के दौरान डॉक्टर के पास से 19,000 रुपये और उनकी सहयोगी अनिला से 1,000 रुपये बरामद हुए थे. आरोप था कि डॉक्टर एजेंट के जरिए अवैध रूप से यह पता लगा रही थीं कि गर्भ में लड़का है या लड़की.

(मामले की सह-आरोपी अनिला की मौत हो चुकी है, इसलिए उनके खिलाफ केस खत्म हो गया है)

हाईकोर्ट क्यों पहुंचा मामला?

बांसवाड़ा की निचली अदालत (सेशन कोर्ट) ने डॉक्टर पर लिंग जांच की धाराओं के साथ-साथ IPC की धारा 315/511 (बच्चे को जन्म से पहले मारने का प्रयास) और 120-बी (साजिश) के तहत भी आरोप तय कर दिए थे. डॉक्टर ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी. हाईकोर्ट ने पहले भी निचली अदालत को इन धाराओं पर पुनर्विचार करने को कहा था, लेकिन जब 20 जनवरी 2024 को निचली अदालत ने फिर से वही गंभीर धाराएं लगा दीं, तो डॉक्टर दोबारा हाईकोर्ट पहुंचीं.

अदालत सिर्फ 'पोस्ट ऑफिस' नहीं है: HC

जस्टिस फरजंद अली की बेंच ने सुनवाई के दौरान बहुत महत्वपूर्ण बातें कहीं. उन्होंने कहा, 'लिंग जांच करना और गर्भपात करना, दोनों अलग-अलग मेडिकल प्रक्रियाएं हैं. सिर्फ लिंग जांच की फीस लेने से यह साबित नहीं होता कि गर्भ गिराने की तैयारी भी की गई थी.' हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले (डॉ. आनन्द राय बनाम स्टेट ऑफ मध्य प्रदेश) का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि सिर्फ आशंका के आधार पर गंभीर धाराएं नहीं लगाई जा सकतीं. जज ने कहा कि ट्रायल कोर्ट को केवल अभियोजन (Prosecution) की बात दोहराने वाला 'माउथपीस' या 'पोस्ट ऑफिस' नहीं बनना चाहिए. आरोप तय करने से पहले सबूतों को देखना जरूरी है.

अब आगे क्या होगा?

हाईकोर्ट ने डॉ. अनामिका भारद्वाज पर लगी IPC की धारा 315/511 और 120-बी के आरोपों को पूरी तरह रद्द (निरस्त) कर दिया है. अब डॉक्टर पर गर्भपात की साजिश का मुकदमा नहीं चलेगा. हालांकि, पीसीपीएनडीटी एक्ट (लिंग जांच से जुड़े कानून) के तहत बाकी धाराओं में ट्रायल कोर्ट में सुनवाई जारी रहेगी.

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