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Explainer- आखिर कांग्रेस में वापस क्यों आना चाहते हैं महेंद्रजीत सिंह? बीजेपी को कितना होगा नुकसान

महेंद्रजीत सिंह मालवीया फिर से कांग्रेस में वापसी की तैयारी कर रहे हैं. लेकिन सबसे बड़ा सवाल है कि तवज्जों देने वाली बीजेपी में जाने के बाद वह कांग्रेस में फिर से वापसी क्यों करना चाहते हैं.

Explainer- आखिर कांग्रेस में वापस क्यों आना चाहते हैं महेंद्रजीत सिंह? बीजेपी को कितना होगा नुकसान
महेंद्रजीत सिंह मालवीया

Mahendrajeet Singh Malviya: वागड़ की राजनीति में लंबे अरसे तक कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे महेंद्रजीत सिंह मालवीया एक बार फिर कांग्रेस में वापसी कर सकते हैं. मीडिया से बातचीत के दौरान उन्होंने ये संकेत दिए. उनका भाजपा छोड़ कांग्रेस से जुड़ना दक्षिणी राजस्थान के आदिवासी अंचल की राजनीति में एक बड़ा राजनीतिक बदलाव लाएगा. अब कुछ लोग इस बदलाव को निकाय चुनाव से पहले कांग्रेस की रणनीतिक बढ़त बता रहे हैं तो कुछ इसे बागीदौरा विधानसभा सीट पर उपचुनाव की संभावनाओं से जोड़ रहे हैं. वहीं, राजनीतिक गलियारों में ये चर्चा भी है कि मालवीया भाजपा की संगठन की राजनीति में फिट नहीं बैठ पाए.

मालवीया का कांग्रेस में लंबा सफर

महेंद्रजीत सिंह मालवीया करीब 35 साल तक कांग्रेस के साथी रहे. जब कांग्रेस का वोट प्रतिशत गिर रहा था. तब भी मालवीया मजबूत उम्मीदवार बने रहे. विधानसभा सीटों पर 2023 के विधानसभा चुनाव में 1 लाख वोट हासिल करने वाले वे इकलौते कांग्रेस उम्मीदवार रहे. उन्होंने सरपंच से प्रधान, विधायक और सांसद के चुनाव तक का सफर तय किया है. अशोक गहलोत की सरकार में वे दो बार मंत्री भी बने. इसके बाद उन्हें कांग्रेस वर्किंग कमेटी का सदस्य भी बनाया गया. राजस्थान कांग्रेस के पूर्व उपाध्यक्ष भी रह चुके हैं. दक्षिणी राजस्थान, खासकर बांसवाड़ा-डूंगरपुर में उनका मजबूत जनाधार है. 

करीब 35 साल से अधिक समय से वे कांग्रेस से जुड़े रहे. इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा का दामन थामा. हालांकि वे भाजपा को 2024 के लोकसभा चुनाव में जीत नहीं दिला पाए.

क्यों भाजपा के लिए जरूरी रहे मालवीया

भारतीय जनता पार्टी के लिए राजस्थान के आदिवासी अंचल में फिसलते आदिवासी वोटों को रोकना बड़ी चुनौती है. आंकड़े बताते हैं कि यहां भाजपा का वोट प्रतिशत घट रहा है. बांसवाड़ा - डूंगरपुर लोकसभा क्षेत्र में 8 विधानसभा सीट आती है. चौरासी, डूंगरपुर, गढ़ी, सागवाड़ा, कुशलगढ़, बागीदौरा, घाटोल और बांसवाड़ा. 

इन सभी विधानसभा सीटों पर 2018 में भाजपा का वोट प्रतिशत 36.76 फीसदी था. वहीं, 2023 विधानसभा में यह प्रतिशत घट कर करीब 29.6 फीसदी हो गया. वहीं, इस क्षेत्र में उभरती आदिवासी पार्टी अपना हाथ इस क्षेत्र में फैला रही है. जहां भारतीय ट्राइबल पार्टी का वोट प्रतिशत 2018 में 15.51 फीसदी था. वहीं, इसी पार्टी से अलग होकर बनी भारत आदिवासी पार्टी ने 2023 में 29.78 प्रतिशत मत हासिल किए. 

आदिवासी समुदाय कांग्रेस के पारंपरिक वोटर माने जाते हैं. 2023 में यहां 8 में से 5 सीट कांग्रेस ने जीती. लोकसभा क्षेत्र में भी 2024 में भाजपा का वोट प्रतिशत करीब 15 फीसदी घट गया है. 

भाजपा आदिवासी वोटों को साधने के लिए विकास और हिंदुत्व का संदेश लेकर चल रही है. वनवासी कल्याण परिषद के जरिए भी भाजपा आदिवासियों के बीच अपनी पैठ बनाने का प्रयास कर रही है. लेकिन भाजपा को एक नेता की दरकार थी. आदिवासी क्षेत्रों की राजनीति में अक्सर एक नेता पर केंद्रित राजनीति देखी जाती है. इसलिए भाजपा ने मालवीया को उस नेता के रूप में प्रोजेक्ट किया. 

मालवीया ने क्यों थामा भाजपा का हाथ

महेंद्रजीत सिंह मालवीया ने भाजपा से जुड़ते वक्त कहा कि पीएम मोदी की नीतियों ने प्रभावित किया. कांग्रेस ने राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में जाने से मना किया तो मन को ठेस लगी. हालांकि, राजकुमार रोत और कांग्रेस के कई नेताओं ने चुनावी सभाओं से आरोप लगाए कि उन्होंने ईडी की कार्रवाई के डर से भाजपा का दामन थामा. 

इसके अलावा राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विधानसभा चुनाव 2023 में राजस्थान में भाजपा सरकार बना चुकी थी. मालवीया ने केंद्र और राज्य की सरकार के सामंजस्य में रहना चुना. 

एक चर्चा ये भी रही कि विधानसभा चुनाव के बाद मालवीया ने कांग्रेस पार्टी से किसी आदिवासी नेता को नेता प्रतिपक्ष बनाने के लिए कहा. लेकिन पार्टी ने टीकाराम जूली को नेता प्रतिपक्ष बनाया. 

अब कांग्रेस में फिर से वापसी का मन क्यों बनाया

महेंद्रजीत सिंह मालवीया कहते हैं कि उन्होंने भाजपा से जो उम्मीद की थी. उस पर पार्टी खरी नहीं उतरी. कुछ राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कांग्रेस में मालवीया का अलग दबदबा था. वागड़ में मालवीया कांग्रेस की एक अलग धारा का नेतृत्व करते थे. भाजपा की संगठन केंद्रित राजनीति में वे अपनी लीडर सेंट्रिक पॉलिटिक्स के लिए जगह नहीं बना पाए. उन्हें भाजपा में वह स्वायत्तता नहीं मिल पाई जो कांग्रेस में हासिल थी. 

इसके अलावा कुछ जानकारों का मानना है कि बागीदौरा सीट से विधायक जय कृष्ण पटेल भ्रष्टाचार के मामले में जांच से गुजर रहे हैं. ऐसे में मालवीया पार्टी पर उनकी सदस्यता समाप्त कर, उपचुनाव करवाने का दबाव बना रहे थे. इस सीट से चुनाव लड़, वे राज्य में मंत्री बनना चाहते हैं. लेकिन बात नहीं बनी तो अब पार्टी छोड़ने की बात कह रहे हैं.

वहीं, उनके इस कदम को हाल ही में बांसवाड़ा से भारत आदिवासी पार्टी के सासंद राजकुमार रोत और उदयपुर सांसद  मन्नालाल रावत के बीच हुई कहासुनी से भी जोड़ रहे हैं. मालवीया निकाय और पंचायत चुनाव से पहले कांग्रेस में आकर अपने वोटर्स को मजबूत करना चाहते हैं. क्षेत्र में राजकुमार रोत के बढ़ते प्रभाव के बीच वे अपने पारंपरिक वोटर से जुड़ना चाहते हैं.

उनकी पत्नी रेशम मालवीया ने एनडीटीवी से बातचीत में कहा कि उनके कांग्रेस से जुड़ने की योजना का अभी उन्हें पता नहीं है. लेकिन लंबे समय से कार्यकर्ता उनसे ऐसा करने की मांग कर रहे हैं. हालांकि अभी मुझे ऐसा कुछ नहीं पता. मैंने भी टीवी से ही देखा. 

कांग्रेस के लिए क्यों जरूरी मालवीया

महेंद्रजीत सिंह मालवीया बिना शक के वागड़ में कांग्रेस के सबसे मजबूत नेताओं में से एक है. भारत आदिवासी पार्टी के बढ़ते प्रभाव के बीच पारंपरिक रूप से कांग्रेस समर्थित आदिवासी अंचल में अपना प्रभुत्व बचाए रखना पार्टी के लिए भी चुनौती है. आकंड़ों की बात करें तो 2018 में कांग्रेस का वोट प्रतिशत 33.7 था, जो 2023 में घटकर 31.81 हो गया. वहीं, लोकसभा चुनाव में लगातार दो हार के बाद 2024 में कांग्रेस को बीएपी से गठबंधन करना पड़ा. ऐसे में निकाय चुनाव से ठीक पहले मालवीया का कांग्रेस से जुड़ना, कांग्रेस के लिए बड़ी रणनीतिक बढ़त साबित होगा.

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