राजस्थान हाई कोर्ट ने प्रदेश में प्रचलित नाता प्रथा परंपरा के बारे में एक अहम फैसला दिया है जिसकी बड़ी चर्चा हो रही है. राजस्थान हाई कोर्ट ने कोटा की एक महिला रामप्यारी को पति की मौत के बाद पेंशन का हकदार मानते हुए पेंशन देने के आदेश जारी किए हैं. रामप्यारी नाता प्रथा के तहत पत्नी बनी थी और इस वजह से उनके पेंशन का मामला उलझ गया था. लेकिन अब राजस्थान हाई कोर्ट के फैसले से उन्हें पेंशन मिलने का रास्ता साफ हो गया है. समझा जा रहा है कि हाई कोर्ट का यह फैसला राजस्थान में इस तरह से नाता प्रथा के तहत पत्नी बनने वाली महिलाओं के लिए एक नज़ीर साबित हो सकता है.
क्या होती है नाता प्रथा
नाता प्रथा राजस्थान की एक पुरानी सामाजिक परंपरा है, जो ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्रों में प्रचलित है. इसमें महिला पति से अलग होने के बाद समाज की सहमति से किसी भी अन्य पुरुष के साथ रह सकती है. इस संबंध को समाज में विवाह जैसा ही सामाजिक दर्जा आज भी दिया जाता है. नाता प्रथा का उद्देश्य महिला को सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा देना माना जाता है.
रामप्यारी का मामला
कोटा निवासी रामप्यारी सुमन करीब 36 साल पहले सरकारी सेवा में कार्यरत पटवारी पूरन लाल सुमन के घर पत्नी बनकर गई थीं. पटवारी की पत्नी की मृत्यु के बाद समाज की सहमति से रामप्यारी नाते के तौर पर पटवारी के घर गई थीं.
पूरनलाल के पहली पत्नी से दो बच्चे थे. उसके बाद रामप्यारी सुमन की को भी एक बेटी हुई. लेकिन रामप्यारी सुमन परिवार में होने वाले झगड़ों के चलते वापस अपने पिता के घर चली आई.
इसके बाद उन्होंने 1995 में बेटी और खुद की परवरिश के लिए पति से गुजारा भत्ता पाने के लिए कोर्ट में अर्जी लगाई, जिसके बाद कोर्ट ने गुजारा भत्ता देने के निर्देश दिए.साल 2020 में उनके पटवारी पति की मृत्यु हो गई. इसके बाद साल 2022 में रामप्यारी ने राजस्थान हाई कोर्ट में पति की मृत्यु के बाद पत्नी को दी जाने वाली पेंशन के लिए अर्जी लगाई.
हाई कोर्ट का फैसला और रामप्यारी की प्रतिक्रिया
इसी अर्जी पर अब हाई कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया है और रामप्यारी सुमन को पटवारी की वैधानिक पत्नी मानते हुए, पति की मौत के बाद दी जाने वाली पेंशन का हक प्रदान किया है. हाई कोर्ट के फैसले का रामप्यारी बाई ने स्वागत करते हुए आभार व्यक्त किया है. उन्होंने कहा, "जिस अधिकार के लिए मैं लड़ाई लड़ रही थी, उसकी जीत हुई है. मैं अदालत को बहुत धन्यवाद देती हूं कि उन्होंने मेरी पीड़ा को समझा और साथ दिया. मेरी तरह और भी बहनें अगर इसी तरह परेशान होती हैं तो उन्हें न्याय मिलना चाहिए."
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