
Rajasthan News: भारत और दुनिया के सामने आज एक बड़ा संकट है, और वो है जलवायु परिवर्तन (Climate Change). हम सब देख रहे हैं कि मौसम का मिजाज कैसे बदल रहा है, कभी भयानक गर्मी तो कभी बेमौसम बारिश. कहीं सूखा पड़ रहा है तो कहीं बाढ़ आ रही है. इन सब समस्याओं का समाधान कहां है? इस पर देश के कई जानकार, वैज्ञानिक और चिंतक अलग-अलग विचार रख रहे हैं. इन्हीं विचारों को लेकर जयपुर के मणिपाल विश्वविद्यालय (Manipal University Jaipur) में एक खास कार्यक्रम हुआ.
जयपुर के मणिपाल यूनिवर्सिटी में भारतीय ज्ञान परंपरा (Indian Knowledge System) को आधार बनाकर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी (National Seminar) का आयोजन किया गया. इसका विषय था: "ऊर्जा, स्थिरता और जलवायु परिवर्तन: भारतीय ज्ञान प्रणाली एवं दृष्टिकोण". इस कार्यक्रम में कई बड़े विद्वानों और पर्यावरण विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया. सभी का एक ही मत था - जलवायु संकट को अगर खत्म करना है तो हमें अपनी पुरानी भारतीय परंपराओं की तरफ लौटना होगा.
क्यों खास है भारतीय ज्ञान परंपरा?
इस संगोष्ठी में अयोध्या के हनुमंत निवास के पीठाधीश्वर आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरण ने मुख्य तौर पर अपनी बात रखी. उन्होंने कहा कि हमारी भारतीय संस्कृति और परंपरा में हर काम पर्यावरण से जुड़ा है. हमारे तीज-त्योहार, पूजा-पाठ और रोजमर्रा के काम भी प्रकृति के प्रति सम्मान और समर्पण को दिखाते हैं. वे मानते हैं कि "दुनिया का कोई भी पौधा ऐसा नहीं है जिसमें औषधीय गुण न हों." हर क्रांति की शुरुआत एक छोटे से विचार से होती है, और फिर वो एक बड़ा आंदोलन बन जाता है. आज पर्यावरण को बचाने के लिए भी ऐसी ही सोच और कोशिश की जरूरत है.
छोटे प्रयास, बड़ा असर
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के पर्यावरण संयोजक गोपाल आर्य ने इस कार्यक्रम में आए लोगों को एक खास संकल्प दिलवाया. उन्होंने कहा कि अगर हम अपने रोजमर्रा के कामों में भी पर्यावरण का ध्यान रखें, तो हम बहुत कुछ बदल सकते हैं. जैसे, "अगर आप एक गिलास पूरा पानी पी लेते हैं, तो यह भी एक तरह का संरक्षण है." उन्होंने जोर देकर कहा कि पेड़ लगाना, पानी बचाना और पॉलीथीन का इस्तेमाल बंद करना ही हमारी धरती और पर्यावरण को बचा सकता है.
मणिपाल विश्वविद्यालय की प्रोवोस्ट डॉ. नीतू भटनागर ने भी इस बात पर जोर दिया कि पर्यावरण को बचाना हर किसी की जिम्मेदारी है, खासकर शिक्षा से जुड़े लोगों को इसमें आगे आना चाहिए.
जागरूकता और सामूहिक जिम्मेदारी
राजस्थान सरकार के उच्च शिक्षा आयुक्त ओ.पी. बैरवा ने भी इस संगोष्ठी में हिस्सा लिया. उन्होंने कहा कि आम लोगों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाना बहुत जरूरी है. वहीं, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के संजय स्वामी ने प्लास्टिक के नुकसान के बारे में विस्तार से बताया. उन्होंने कहा कि युवाओं को इस मुहिम का हिस्सा बनाना चाहिए ताकि वो जिम्मेदारी को समझकर पर्यावरण की सुरक्षा में अपनी भूमिका निभा सकें.
इसी संस्था के नितिन के. जैन ने कहा कि पर्यावरण की सुरक्षा किसी एक व्यक्ति या संस्था का काम नहीं है, बल्कि ये हम सबकी एक सामूहिक जिम्मेदारी है.
रिसर्च और आधुनिकता का तालमेल
तकनीकी सत्र में देशभर से आए कई शोधकर्ताओं ने अपने रिसर्च पेपर पेश किए. इसमें उन्होंने बताया कि कैसे हम आज की आधुनिक समस्याओं का समाधान अपनी पुरानी परंपराओं में ढूंढ सकते हैं. जोधपुर के एमबीएम विश्वविद्यालय के प्रो. मिलिंद कुमार शर्मा ने भारतीय ज्ञान प्रणाली में "रीसाइकिल" (Recycle) और "रीयूज़" (Reuse) की सदियों पुरानी परंपराओं पर बात की. वहीं, इनोवेटिव गर्वनेंस रिफॉर्म फेडरेशन के डॉ. विजय व्यास ने जलवायु परिवर्तन के वैश्विक असर पर अपनी बात रखी.
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