Rajasthan News: जयपुर अब सिर्फ किलों और महलों का नहीं, बल्कि शहरी वन्यजीव संघर्ष का केंद्र बनता जा रहा है. गुरुवार सुबह सिविल लाइन्स जैसे अति महत्वपूर्ण VIP इलाके में एक तेंदुआ घुस आया, जिससे दो घंटे तक हाई अलर्ट रहा. वन विभाग ने उसे ट्रैंक्विलाइजर से सुरक्षित पकड़ा, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि झालाना और नाहरगढ़ के जंगल से बार-बार तेंदुए शहर की ओर क्यों आ रहे हैं? इसका जवाब जयपुर के बदलते पारिस्थितिक तंत्र और अनियोजित शहरीकरण में छिपा है.
पूर्व डिप्टी CM के बंगले के पास दिखा लेपर्ड
गुरुवार सुबह करीब 8 बजे जयपुर की सबसे सुरक्षित मानी जाने वाली सिविल लाइन्स कॉलोनी में हड़कंप मच गया. यह वह क्षेत्र है जहां राजभवन, मुख्यमंत्री निवास और कई मंत्रियों के आवास स्थित हैं. तेंदुआ पहले लेन नंबर 6 में देखा गया, फिर भागते हुए पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट के बंगले के पास पहुंचा. इसके बाद वह जल संसाधन मंत्री सुरेश सिंह रावत के आवास में भी दाखिल हो गया.

करीब डेढ़ घंटे की मशक्कत के बाद पकड़ा गया सिविल लाइन्स में घुसा तेंदुआ.
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वन विभाग की टीम करीब दो घंटे तक लेपर्ड की लोकेशन ट्रेस करने में जुटी रही. लगातार मूवमेंट बदलने के कारण रेस्क्यू ऑपरेशन मुश्किल हो गया. आखिरकार, तेंदुआ एक पास के मकान की पिछली लॉबी में जाकर छिप गया, जहां टीम ने उसे बेहोश कर सुरक्षित पकड़ लिया.
सिर्फ एक भटकना नहीं, बार-बार हो रही है घटना
वन्य जीव चिकित्सक डॉ. अशोक तंवर ने पुष्टि की कि यह कोई अकेली घटना नहीं है. पिछले कुछ महीनों में जयपुर के अलग-अलग इलाकों में कई तेंदुए देखे गए हैं. इसी सप्ताह गुर्जर घाटी में भीड़ ने एक लेपर्ड को घेरकर पीट दिया था, जिसकी बाद में मौत हो गई. गोपालपुरा पुलिया के पास एक फैक्ट्री में घुसे लेपर्ड को पकड़ने में 60 घंटे लगे थे. विद्याधर नगर इलाके में एक तेंदुए ने तीन लोगों को घायल कर दिया था, जिसे नाहरगढ़ बायोलॉजिकल पार्क भेजा गया था. मालवीय नगर और दुर्गापुरा में भी तेंदुओं की मौजूदगी ने दहशत फैलाई थी.
फिर सवाल वही कि बार-बार शहर में तेंदुआ क्यों दिख रहा है. इसका जवाब शहर और जंगल के बीच बदलते संतुलन में छिपा है.
कारण 1: झालाना जंगल की क्षमता पूरी

प्रधान मुख्य वन संरक्षक शिखा मेहरा और अन्य विशेषज्ञों के मुताबिक, बार-बार तेंदुओं के शहर में आने का सबसे बड़ा कारण झालाना लेपर्ड रिजर्व (Jhalana Amagarh Leopard Conservation Reserve) की बढ़ती आबादी है. झालाना देश का सबसे सफल शहरी जंगल माना जाता है, जहां वर्तमान में लगभग 30 तेंदुए रहते हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि झालाना अब अपनी कैरीइंग कैपेसिटी (Carrying Capacity) यानी वहन क्षमता तक पहुंच चुका है. जब जंगल में दबाव बढ़ता है, तो युवा नर तेंदुए नए क्षेत्रों की तलाश में बाहर निकलते हैं और शहरी इलाकों में प्रवेश करते हैं.
कारण 2: खत्म हो चुका है 'बफर जोन' और प्राकृतिक गलियारा

शहर का अनियंत्रित विस्तार जंगल और आवासीय क्षेत्रों के बीच मौजूद बफर जोन को लगभग खत्म कर चुका है. आमागढ़ और नाहरगढ़ के जंगलों के किनारों पर तेजी से बनी नई कॉलोनियां, तेंदुओं के पारंपरिक प्राकृतिक कोरिडोर (Natural Corridors) पर सीधा हस्तक्षेप कर रही हैं. चौड़ी सड़कें, रेललाइनें और निर्माण कार्य इन प्राकृतिक रास्तों को बाधित कर देते हैं, जिससे तेंदुए भटककर आबादी वाले इलाकों में आ जाते हैं.
कारण 3: भोजन की तलाश और आसान शिकार

तेंदुए के आबादी क्षेत्र में आने के पीछे एक बड़ी वजह भोजन की तलाश भी है. जंगल में खरगोश, नीलगाय के बच्चे या छोटे हिरन जैसे शिकार की कमी होने पर, ये शिकारी पालतू जानवरों (जैसे कुत्ते) और शहर के आसपास मौजूद जीवों की तलाश में रिहायशी इलाकों की ओर बढ़ते हैं, जहां उन्हें आसानी से शिकार मिल जाता है.
अब चाहिए 'वाइल्डलाइफ सेंसिटिव' अर्बन प्लानिंगसिविल लाइन्स की घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जयपुर को अब वाइल्डलाइफ सेंसिटिव अर्बन प्लानिंग की ओर बढ़ना होगा.
- बफर जोन का संरक्षण: जंगलों और शहर के बीच के बफर जोन को कानूनी रूप से सुरक्षित करना अनिवार्य है.
- रेडियो कॉलरिंग: तेंदुओं की मूवमेंट को ट्रैक करने के लिए रेडियो कॉलर जैसे वैज्ञानिक उपाय अपनाना समय की मांग है.
- जागरूकता: हर बार एक ही पैटर्न दिखाई देता है—रात में मूवमेंट, सुबह होते ही भीड़ और फिर अफरा-तफरी. भीड़ की मौजूदगी तेंदुए को और आक्रामक बना सकती है, जो इंसान और जानवर दोनों के लिए खतरनाक है.
सिविल लाइन्स में घुसा तेंदुआ इस बात का सबूत है कि जयपुर में जंगल और शहर के बीच की दूरी लगातार कम हो रही है. यदि तेंदुओं के प्राकृतिक मार्ग सुरक्षित नहीं रखे गए, तो ऐसे दृश्य बार-बार सामने आएंगे.
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