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राजस्थान में 600 साल पुराना रहस्यमयी हनुमान मंदिर, जहां पर्चे वाले बालाजी करते हैं भक्तों की मनोकामना पूरी

राजस्थान में सीकर के रींगस में स्थित 550 साल पुराना गढ़ और पर्चे वाले हनुमान जी का मंदिर आस्था का बड़ा केंद्र है. यहां सालासर बालाजी जैसे दर्शन होते हैं और स्थानीय लोग इस विरासत को बचाने में जुटे हैं.

राजस्थान में 600 साल पुराना रहस्यमयी हनुमान मंदिर, जहां पर्चे वाले बालाजी करते हैं भक्तों की मनोकामना पूरी
रींगस में स्थित 550 साल पुराना गढ़ और पर्चे वाले हनुमान जी का मंदिर आस्था का बड़ा केंद्र है.

Rajasthan News: राजस्थान अपनी ऐतिहासिक धरोहरों और वीरता की कहानियों के लिए दुनिया भर में जाना जाता है. इसी विरासत का एक अहम हिस्सा सीकर जिले के रींगस में स्थित प्राचीन गढ़ है. यह गढ़ करीब 550 से 600 साल पुराना माना जाता है और आज भी अपने इतिहास और संरचना के कारण लोगों को आकर्षित करता है. स्थानीय लोग इसे रींगस का गढ़ या प्राचीन किला कहते हैं.

राजा उदय सिंह से जुड़ा माना जाता है निर्माण

इतिहासकारों के अनुसार इस गढ़ का निर्माण किसने करवाया इसकी पूरी जानकारी उपलब्ध नहीं है, लेकिन माना जाता है कि इसका निर्माण राजा उदय सिंह ने कराया था. बाद में यह गढ़ सीकर के शासक राव राजा कल्याण सिंह को सौंप दिया गया. समय के साथ देखरेख के अभाव में यह गढ़ खंडहर में बदलने लगा.

लोगों ने मिलकर बचाई अपनी धरोहर

साल 1957 में रींगस के स्थानीय लोगों ने मिलकर इस गढ़ को खरीद लिया. उनका उद्देश्य इस ऐतिहासिक धरोहर को बचाना और यहां स्थित प्राचीन मंदिर की आस्था को बनाए रखना था. गढ़ के भीतर बना करीब 600 साल पुराना बालाजी मंदिर लोगों की गहरी श्रद्धा का केंद्र है, जिसके कारण इसे संरक्षित करने की पहल की गई.

पर्चे वाले हनुमान मंदिर की अनोखी मान्यता

इस गढ़ में स्थित हनुमान मंदिर को पर्चे वाले हनुमान जी के नाम से जाना जाता है. मान्यता है कि यहां आने वाले भक्तों को बालाजी का साक्षात अनुभव होता है. खास बात यह है कि मंदिर में स्थापित मूर्ति सालासर बालाजी की तरह दिखाई देती है. यहां दर्शन करने वाले श्रद्धालु मानते हैं कि उन्हें सालासर धाम जैसे ही दर्शन मिलते हैं.

युद्ध और सुरक्षा का केंद्र रहा गढ़

गढ़ की बनावट भी बेहद खास है. इसके चारों ओर मजबूत बुर्ज बने हुए हैं और चारों तरफ गहरी खाई मौजूद है, जिसमें कभी पानी भरा रहता था. ऐतिहासिक रूप से यह क्षेत्र जयपुर और सीकर के शासकों के बीच युद्ध भूमि के रूप में इस्तेमाल होता था. सैनिकों को सुरक्षा और ठहरने के लिए इस गढ़ का उपयोग किया जाता था.

आज भी जारी है संरक्षण का प्रयास

वर्तमान में इस गढ़ के करीब 10 मालिक हैं, जो इसकी देखरेख कर रहे हैं. स्थानीय लोग लगातार इस ऐतिहासिक धरोहर और मंदिर की पूजा व्यवस्था को बनाए रखने के लिए प्रयास कर रहे हैं. यह गढ़ आज भी आस्था, इतिहास और संस्कृति का जीवंत उदाहरण बना हुआ है.

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